घोड़े पर सवार होकर आएंगी आदि शक्ति

पं. गोपाल जी महाराज ने बताया के इन दिनों लोग मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की आराधना और पूजा- अर्चना करते हैं। साथ ही माता का आह्वान होने पर मां किस वाहन पर सवार होकर आएंगी ये भी विशेष महत्वपूर्ण होता है। माता का वाहन शुभ− अशुभ फल का सूचक भी होता है। पं. गोपाल जी महाराज के अनुसार इस बार माता घोड़े पर सवार होकर आएंगी। आपको बता दें कि मां दुर्गा के अलग- अलग वाहन का महत्व होता है। वहीं इस साल चैत्र नवरात्रि 2 अप्रैल से शुरू हो रहीं हैं और यह पर्व 10 अप्रैल तक मनाया जाएगा। आइए जानते हैं माता के वाहन का महत्व और क्या है मान्यता…
मान्यता है कि नवरात्रि में मां दुर्गा का आगमन कैलाश पर्वत से पृथ्वी पर होता है। पृथ्वी पर भक्त मां दुर्गा की आराधना-पूजा, जप, तप और साधना करके उनकी कृपा पाने का प्रयास करते हैं। देवी मां जब कैलाश पर्वत से पृथ्वी पर आती हैं तो वह किसी न किसी वाहन पर सवार होकर आती हैं और जाते समय भी किसी वाहन पर जाती हैं। वहीं देवी के आगमन का वाहन नवरात्रि प्रारंभ होने के दिन से तय होता है और जाने का वाहन नवरात्रि समाप्त होने के दिन से तय होता है। इसके लिए देवी भागवत पुराण में एक श्लोक दिया गया है –
शशिसूर्ये गजारूढ़ा शनिभौमे तुरंगमे।

गुरौ शुक्रे च दोलायां बुधे नौका प्रकीर्त्तिता।
सोमवार या रविवार को घट स्थापना होने पर मां दुर्गा हाथी पर सवार होकर आती हैं। शनिवार या मंगलवार को नवरात्रि प्रारंभ होने पर देवी का वाहन घोड़ा होता है। गुरुवार या शुक्रवार को नवरात्रि शुरू होने पर देवी डोली में बैठकर आती हैं। बुधवार से नवरात्रि शुरू होने पर मां दुर्गा नाव पर सवार होकर आती हैं।
देवी के आगमन के वाहन से शुभ-अशुभ का विचार किया जाता है। मान्यता है माता दुर्गा जिस वाहन से पृथ्वी पर आती हैं, उसके अनुसार आगामी छह माह में होने वाली घटनाओं का आंकलन किया जाता है। इसके लिए भी देवी भागवत पुराण में एक श्लोक है-

गजे च जलदा देवी क्षत्र भंग स्तुरंगमे।

नौकायां सर्वसिद्धिस्या दोलायां मरणंधुवम्।
देवी जब हाथी पर सवार होकर आती हैं तो वर्षा ज्यादा होती है। घोड़े पर आती हैं तो पड़ोसी देशों से युद्ध की आशंका बढ़ जाती है। देवी नौका पर आती हैं तो सभी के लिए सर्वसिद्धिदायक होता है और डोली पर आती हैं तो किसी महामारी से मृत्यु का भय बना रहता हैं।
माता के विदाई वाहन का भी है महत्व:

आपको बता दें कि आगमन की तरह मां दुर्गा की विदाइ भी अलग अलग वाहन से होती है। रविवार या सोमवार को माता रानी भैंसे की सवारी से प्रस्थान करती हैं। जिससे देश में रोग और कष्ट बढ़ता है। शनिवार या मंगलवार को मां जगदम्बा मुर्गे पर सवार होकर जाती हैं। जिससे जनता में दुख और कष्ट बढ़ने की मान्यता है। बुधवार या शुक्रवार को देवी आदि शक्ति हाथी पर सवार होकर प्रस्थान करती हैं। इससे बारिश ज्यादा होने की संभावना होती है। साथ ही गुरुवार को महागौरी मनुष्य की सवारी से जाती हैं। इसका अर्थ है कि सुख-शांति बनी रहेगी नवरात्रि के 09 दिनों में करें देवी पूजा का महाउपाय, शीघ्र ही पूरी होगी मनोकामनाएं पूरी
क्योंकि इसके प्रथम दिन से ही हिंदू नव संवत्‍सर का आरंभ होता है
नवरात्रि के दिनों में देवी दुर्गा स्वर्गलोक से पृथ्वी पर पधारती हैं ऐसे में देवी की उपासना स्थल बहुत ही साफ और सुथरा होना चाहिए। पूजन कक्ष की दीवारें हल्के पीले, गुलाबी , हरे और बैंगनी रंगों की होनी चाहिए। क्योंकि ये रंग सकारात्मक ऊर्जा के स्तर को बढ़ाते हैं। भूलकर भी मां दुर्गा के पूजास्थल का रंग काले, नीले और भूरे जैसे तामसिक रंगों का नहीं होना चाहिए।
कलश स्थापना की सही जगह
वास्तु के अनुसार मानसिक स्पष्टता और प्रज्ञा का दिशा क्षेत्र ईशान कोण यानि कि उत्तर-पूर्व दिशा को पूजा-पाठ के लिए श्रेष्ठ माना गया है। इस दिशा में पूजा करने से शुभ प्रभाव मिलता है और हमेशा ईश्वर का आशीर्वाद मिलता रहता है। इसलिए नवरात्रि के दिनों में माता की प्रतिमा या कलश की स्थापना इसी दिशा में करनी चाहिए।
इस दिशा में मुख रखते हुए करें देवी उपासना
देवी मां का क्षेत्र दक्षिण और दक्षिण पूर्व दिशा माना गया है इसलिए यह ध्यान रहे कि पूजा करते वक्त आराधक का मुख दक्षिण या पूर्व में ही रहे। शक्ति और समृद्धि का प्रतीक मानी जाने वाली पूर्व दिशा की ओर मुख करके पूजा करने से हमारी प्रज्ञा जागृत होती है एवं दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पूजा करने से आराधक को मानसिक शांति अनुभव होती है।
दीपक की दिशा
नवरात्रि के दिनों में अखंड ज्योति जलाने की विशेष परंपरा होती है। अखंड दीप को पूजा स्थल के आग्नेय यानि दक्षिण-पूर्व में रखना शुभ होता है क्योंकि यह दिशा अग्नितत्व का प्रतिनिधित्व करती है।आग्नेय कोण में अखंड ज्योति या दीपक रखने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है तथा घर में सुख-समृद्धि का निवास होता है।
पूजन सामग्री का महत्व
देवी दुर्गा के पूजन में प्रयोग होने वाली पूजा सामग्री पूजन स्थल के आग्नेय कोण में ही रखी जानी चाहिए। देवी मां को लाल रंग अत्याधिक प्रिय है। लाल रंग को वास्तु में भी शक्ति और शौर्य का प्रतीक माना गया है अतः माता को अर्पित किए जाने वाले वस्त्र,श्रृंगार की वस्तुएं एवं पुष्प यथा संभव लाल रंग के ही होने चाहिए। पूजा कक्ष के दरवाज़े पर हल्दी,सिन्दूर या रोली से दोनों तरफ स्वास्तिक बना देने से घर में नकारात्मक शक्तियां प्रवेश नहीं करती हैं।
प्रसन्न होंगी देवी मां
वास्तुशास्त्र के अनुसार शंख ध्वनि व घंटानाद करने से देवी-देवता प्रसन्न होते हैं और आस-पास का वातावरण शुद्ध और पवित्र होकर मन-मस्तिष्क में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। अनेक वैज्ञानिक शोधों से स्पष्ट हुआ है कि जिस स्थान पर शंख ध्वनि होती है वहां सभी प्रकार के कीटाणु नष्ट हो जाते है।
कन्या पूजन का महत्व
नवरात्रि के दिनों में 10 वर्ष की छोटी कन्याओं को देवी का रूप मानकर आदर-सत्कार करने और नियमित भोजन कराने से घर का वास्तुदोष दूर होता है। परिवार पर सदैव मां भगवती की कृपा बनी रहती है।

चैत्र मास की नवरात्रि के पहले दिन यानि प्रतिपदा तिथि पर माता शैलपुत्री की पूजा का विधान है. इस दिन शक्ति की साधना गाय के घी से करनी चाहिए. मान्यता है कि देवी के शैलपुत्री स्वरूप को गाय का घी अर्पण करने से साधक को सुख-संपत्ति और आरोग्य की विशेष रूप से कृपा प्राप्त होती है.
चैत्र मास की नवरात्रि के दूसरे दिन यानि मां ब्रह्मचारिणी की पूजा का विधान है. मान्यता है कि इस दिन यदि देवी के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा में शक्कर का भोग लगाकर पूजा की जाए तो साधक की आयु में वृद्धि होती है और उसका जीवन हमेशा सुखमय बना रहता है.
नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा का विधान है. इस दिन देवी दुर्गा के इस स्वरूप की पूजा दूध से करने पर साधक को सभी प्रकार के दु:खों से मुक्ति मिलती है.
चैत्र नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा की पूजा का विधान है. माता के इस स्वरूप की पूजा में मालपुआ का नैवेद्य अर्पण करने पर व्यक्ति को देवी से बुद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है.
नव​रात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा का विधान है. देवी भगवती के इस स्वरूप की पूजा में प्रसाद स्वरूप केले चढ़ाने और किसी ब्राह्मण को दान करने पर साधक का विवेक बढ़ता है. देवी की पूजा से उसमें निर्णय लेने की शक्ति बढ़ती है.
चैत्र नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा का विधान है. इस दिन माता के इस स्वरूप की पूजा में शहद चढ़ाने और किसी ब्राह्मण को दान करने पर व्यक्ति के आकर्षण में बढ़ोत्तरी होती है और उसका आकर्षण बढ़ता है.
चैत्र नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा का विधान है. इस दिन माता के इस स्वरूप की पूजा करते हुए नैवेद्य में गुड़ चढ़ाने और इसका दान किसी ब्राह्मण को करने से साधक के जीवन से जुड़े सभी रोग-शोक दूर होते हैं और उसे भविष्य में किसी भी आकस्मिक विपत्ति का कोई खतरा नहीं रहता है.
चैत्र नवरात्रि के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा का विधान है. इस दिन माता के इस पावन स्वरूप की पूजा करते समय नारियल का भोग अवश्य लगाना चाहिए. मान्यता है कि देवी को इस दिन नारियल चढ़ाने से साधक के जीवन से जुड़े सभी प्रकार के पाप और पीड़ा का शमन होता है.
चैत्र नवरात्रि के नौवें दिन माता सिद्धिदात्री की पूजा का विधाना हैं मान्यता है कि इस दिन इस दिन शक्ति की साधना में धान चढ़ाने और किसी ब्राह्मण को दान करने से साधक को लोक–परलोक का सुख प्राप्त होता है.
पं. गोपाल जी महाराज

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