गणेश गीता ( गीता भाग ७७)

विश्वनाथ त्रिपाठी
कल के भाग में प्राणायाम के प्रकरण में बताया गया था कि १२ अक्षर का प्राणायाम मंत्र लघु कहा जाता है|अब आगे मध्यम व उत्तम के विषय में बताया जाएगा |

चतुर्विंशति अक्षरों यो
मध्यमा स उदाहृत: |
षट्त्रिंशल्लघु वर्णों य,
उत्तम: सोऽभिधीयते ||

चौबीस अक्षरों का प्राणायाम मध्यम व छत्तीस अक्षरों का प्राणायाम उत्तम माना जाता है |

सिंहं शार्दूलकं वापि ,
मत्तेभं मृदुतां तथा |
नयंति प्राणिन: तद्वत्,
प्राणापानौ सुसाधयेत् ||

अतिबलशाली सिंह, बाघ व मतवाले हाथी को जिस प्रकार से मनुष्य उसे नम्र कर कर के अपने अधीन कर लेता है ठीक उसी प्रकार से प्राणायाम के द्वारा इंद्रियों को भी साधना चाहिए |

पीडयंति मृगास्ते न
लोकान् वश्यंगतांनृप|
दहत्येनस्तथा वायु:
संस्तब्धो न च तत्तनुम्||

हे नृपेन्द्र! जिस प्रकार अपने वश में किते हुए सिंहादि अन्य मृगादि को बताने में संकोच नहीं करते लेकिन वश में करने वालों को। पीड़ित नहीं करते उसी प्रकार से वायु प्राणायाम में स्थिर होकर पापों को भस्म करता है परंतु शरीर को नहीं जलाता |
पूरकं कुंभकं चैव,
रेचकं ततोऽभ्यसेत् |
अतीतानागतज्ञानी,
तत्: स्यात्जगती तले ||

पूरकं ,कुम्भक व रेचक का अभ्यास करके यह प्राणी इस भौतिक जगत् में भूत,भविष्य व वर्तमान का ज्ञाता हो जाता है |

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