गांधी का अहिंसावाद सत्य या मिथ्या

गांधी का अहिंसावाद उतना ही सही है जितना की मोदी के 15 लाख देने वाला जुमला। गांधी के अहिंसा उतना ही तथ्यपरक है जितना राहुल गांधी और गांधी परिवार का दतात्रेय ब्राह्मण होना। गांधी का अहिंसा उतना ही नाटकीय है जितना की ये वाली विडियों —-
कांग्रेस के सेक्यूलरिज्म और गांधी के हिंदी प्रेम का कोई तुलना तो नही किया जा सकता है : कांग्रेस का स्थापना अंग्रेजो ने किया था और गांधी जी अफ्रिका में अंग्रेजो के लिए काम करते थे। गांधी जी को क्रान्तिकारियों में आतंकवाद और विशेष शांतिदूतों में भगवान का वास दिखता था। आज तक तो ये भी नही पता चला कि गांधी जी नें हरिजन किसे कहा था और दलित किसे ? लेकिन उनके द्वारा दिये गये दलित शब्द नें समाज में एक खाई जरूर बना दिया है। ज्यादातर लोगों का मानना है कि दलित का मतलब किसी विशेष जाति और समाज से नही बल्कि गरीब से है।

गांधी उतने ही अहिंसक है जितने की विशेष शांतिदूत है। गांधी का देशप्रेम उतना ही सही था, जितना कि कन्हैया कुमार का है। गांधी उतने ही सत्यवादी थे जितना कि चुनाव के समय में नेताओं के द्वारा झूठ बोलना है। शांतिप्रिय गांधी जी का विशेष शांतिदूत से विशेष लगाव होने पर भले कि किसी ने सवाल न उठाया हो। लेकिन सवाल अपने आप में महत्वपूर्ण है कि गांधी गाय को पूजते थे कि बकरी को। क्योंकि गाय पूजने वाले कभी गाय को काटता नही है लेकिन बकरी पाले इसी लिए जाते है कि विशेष मौके पर उसका वध किया जा सके।
शांतिप्रिय गांधी जी के मृत्यू के बाद उसी प्रकार से कांग्रेस पार्टी और जिन्ना समर्थक के द्वारा नरसंहार किया गया था जैसा कि 1984 में इंदिरा हत्या के बाद सिखों के साथ।
गांधी नें हिंदू प्रेम और अहिंसावादी हथियार से हिंदुओं को नपूंसक बना दिया। गांधी जी का त्याग भावना भी अरविन्द केजरीवाल से कम नही था। जिस प्रकार से केजरीवाल नें आंदोलन में कहा था कि गाड़ी नही लेंगे बंगला नही लेंगे आज सबकुछ लेके बैठा है। आते ही विधायक के तन्ख्वाह भी बढा दिया। बंगले के भीतर 9 करोड़ की लागत से स्वीमिंग पूल बनाया जा रहा है।
ठीक उसी प्रकार से गांधी जी के सेवा मे कई लोगो लगे होते थे। अंग्रेजो नें गांधी जी को विशेष रथ दिया था जिसे जिस पर बैठकर अहिंसावादी गांधी जी आते जाते थे उसे कोई घोड़ा नही बल्कि इंसान खीचते हुए ले जाता। लेकिन उसे अहिंसावादी के दिल कभी नही पसीजा।

आज तक किसी सरकारी महकमे में गांधी जी को बापू का दर्जा नही दिया गया है। लेकिन नेता जो भी हो गुजरातियों के चापलूसी करने के लिए बापू बापू करते है। भारत मां के कोई लाल हो सकता है जैसा कि लाल बहादूर शास्त्री। कोई बापू कैसे हो सकता है।
गांधी का पूरा जीवन दर्शन देखिये तो आपको पता चलेगा कि गांधी जी कितने आदर्शवाद और अहिंसा परमोधर्मी थे। एक बार उनके पत्नि की तबियत ज्यादा खराब हो गया और अंग्रेज नें उनको इंजेक्शन लगवाने के लिए सलाह दिया। लेकिन गांधी जी इंजेक्शन लगवाने को अहिंसा मानते थे, जिसके कारण उन्होंने साफ साफ मना कर दिया। लेकिन अपने बेटे के शराब छुड़ाने के इस्लाम कबूल करने से उनकों कोई परहेज नही था। अहिंसावादी के लिए इंजेक्शन लगाना तो हिंसक होना था लेकिन मांस खाना अहिंसक था। इसी कारण उस फुल सी बच्ची को इस्लामिक उत्पीड़न सहना पड़ा क्योंकि उसने इस्लाम स्वीकार नही किया। गांधी के बेटे ने जो किया उसके लिए गांधी जी को कोई आत्मग्लानि नही था। क्या गांधी जी के बेटे के द्वारा मांस खाना और अपने ही पुत्री का शिलभंग करना हिंसा नही था ?

Iगांधी जी के सत्यवचन मे भी सत्यता कितनी थी। सरदार पटेल को प्रधानमंत्री पद के लिए चुना गया लेकिन नेहरू को प्रधानमंत्री बना दिया गया। गांधी जी ने स्वयं कहा था कि भारत का बटबारा मेरे लाश पर होगा। लेकिन गांधी जी विभाजन के बाद भी जिंदा थे। उन्हे नोआखली और विभाजनकाली मानवीय विभत्सना से भी कोई दुख नही था।
किसने कहा कि भारत को सिर्फ अंग्रेजों से छुटकारा चाहिए था। भारत को मुगलों से भी छुटकारा चाहिए था। भारत 150 साल पूराने गुलामी के जंजीर से पहले भी लूटेरे आतातायी मुगलों के दंश झेल रहा था। जिसके लिए सिख के दशों गुरुओ नें अपना बलिदान दिया था। जिसके लिए महाराणा नें घास की रोटियाँ खायी थी। जिसके लिए वीर शिवाजी नें तलवार उठाया था। हमे उस क्रुर मुगलों से भी आजादी चाहिए थी बटबारा नही। लेकिन ये क्या गांधी नें तो बटबारा करवा दिया। सबसे बड़ी बात जिसने पाकिस्तान पसंद किया वह उसके बाद भी हिन्दुस्तान में रहा। पाकिस्तान में कत्लेआम हुआ लेकिन हिंदुस्तान में शांति रहा, क्योंकि गांधी ने अपने अहिंसा के हथियार से हिंदुओं को नपूंसक बना दिया था।

सबसे बड़ी बात गांधी जी के हत्या के बाद हजारों के संख्या में आरएसएस कार्यकर्ता और ब्राह्मणों की हत्या की गयी वह भी सुनियोजित तरीके से जिस समय में तथाकथित पंडित नेहरू सत्ता में विराजमान थे। मराठा और ब्राह्मणों को लड़ाया गया। यह घटना 1984 के घटना से भी ज्यादा विभत्स था। जिस प्रकार से नोआखली को किसी वामपंथी इतिहासकार नही नही लिखा था उसी प्रकार से इस घटना का जिक्र भी कही नही किया गया।

सवाल तो देश के प्रधानमंत्री से भी पूछना होगा। जब किसी रिकार्ड में मौजूद नही है तो आखिर गांधी को बापू कहकर क्यों बुलाया जाता है। क्या मातृभूमि के कोई पति या पिता हो सकता है ? जब राम कृष्ण धरती के पुत्र है तो गांधी जी पिता है हुए ?

नवोदय टाइम्स में छपे एक लेख के मुताबिक : नई दिल्ली/टीम डिजिटल। पूरे देश को अहिंसा परमो धर्म का संदेश देने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी खुद हिंसा का शिकार हुए। 30 जनवरी 1948 को उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। जिसके बाद से अब तक देश इस दिन को शहीद दिवस के रुप में मनाता है। गोली लगने के बाद गांधी जी इस देश को अलविदा कह गए। इसके बाद भी वे देश के करोड़ों लोगों के जेहन में जिंदा हैं। गांधी जी तो चले गए लेकिन देश के लिए उसूल और सिद्दांतो की एक ऐसी मसाल छोड़ गए कि आजतक देश उन्हें सलाम करता है।

अपने पूरे जीवन में अहिंसा के रास्ते पर चलने वाले बापू हमेशा देश के सीख देते रहे कि अहिंसा ही उन्नती और विकास का सबसे बड़ा मार्ग है। लेकिन खुद गांधी जी की हत्या के बाद देश हिंसा की आग में जला। जगह- जगह मारपीट, पथराव और एक जाति विशेष के खिलाफ प्रायोजित हिंसा का दौर चला जिसे देख कर देश और खास तौर पर गांधी जी के विचारों को मानने वाले आहत थे। गांधी जी की हत्या के बाद देश भर में में आरएसएस के प्रति लोगों में गुस्सा देखा गया और स्वयसेवकों को सड़कों पर पीटने की घटनाएं हुईं। इस हिंसा का सबसे ज्यादा विकराल रुप महाराष्ट्र में देखने को मिला। पूरे प्रदेश में चितपावन ब्राह्मणों को निशाना बनाया गया और उनकी चुन- चुन कर हत्या की गई। अपुष्ट सूत्रों के अनुसार इस हिंसा में सैकड़ों चितपावन ब्राह्मणों की हत्या की गई जिसकी न तो सरकार की ओर से पुष्टि हो पाई है और न ही उनके परिवार और परिजनों का कोई रिकार्ड रखा गया है।

कैसे हुई हत्या…

30 जनवरी 1948 को हिंदू सभा के कार्यकर्ता नाथूराम गोड़से ने बरेटा एम 1934 सेमी-ऑटोमैटिक पिस्तौल से भरी भीड़ में गोली मारकर हत्या कर दी। हत्या से पहले गांधी जी दिल्ली के बिरला भवन में सर्वधर्म प्रार्थना में भाग लेने जा रहे थे। इसी दौरान उन्हें गोली मार दी गई। गाधी जी के सामने से उनके सीने में गोलियां दाग दी गई। जिसके चलते देश ने एक महात्मा के खो दिया।

देश भर में दंगे…

गांधी जी की हत्या के बाद देश में भें दंगे शुरु होने लगे। आरएसएस के लोगों को पीटा जाने लगा। इसके साथ ही आरएसएस के गुरुजी महादेव सदाशिव गोलवलकर के घर पर हमला किया गया। हालांकि पुलिस ने उन्हें बचा लिया। उस घटना के बाद से महाराष्ट्र में अलग-अलग जगहों पर ब्राह्मण विरोधी ध्रुवीकरण शुरू हुआ। पुणे में गोडसे के अखबार के कार्यालय हिंदू राष्ट्र और हिंदुत्ववादी अखबार के दफ्तरों में आग लगा दी।

चितपावन ब्राह्मणों पर हमले…

हिंसा की ये आग इतनी भयानक थी कि इसमें करीब 50 लोगों की जान चली गई। कहा जाता है कि गोडसे चितपावन ब्राह्मण था। जिसके चलते मराठाओं ने चितपावनों को अपने निशाने पर लिया। धीरे- धीरे ये आग इतनी फैल गई की ये सीधे तौर पर ब्राह्मणों और मराठाओं के बीच का दंगा बन गया।

आरएसएस पर लगा बैन..

गांधी जी की हत्या के बाद जवाहर लाल नेहरु ने तत्काल आरएसएस पर बैन लगा दिया। इस तरह के प्रतिबंध कई बार लगे। हालांकि इसके बाद भी स्वंयसेवकों ने इसका विरोध नहीं किया। गोडसे की गिरफ्तारी के बाद भी नाथूराम ने कहा कि वह गांधीवादियों से तर्क करना चाहते हैं। मैंने गांधी को व्यक्तिगत नहीं बल्कि राजनीतिक कारण से मारा है। गोडसे ने कहा था कि उसने एक इंसान की हत्या की है इसलिए उसे फांसी मिलनी चाहिए। इसी आधार पर गोडसे ने हाईकोर्ट में अपील नहीं की। गांधी जी की हत्या की साजिश रचने के मामले में नाथूराम गोडसे और सहयोगी नारायण आप्टे उर्फ नाना को अंबाला जेल में 15 नवंबर 1949 को फांसी दे दी गई।

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