प्रदेश की जातीय राजनीतिक और समाजिक अस्मिता

उत्तर प्रदेश में जातीय राजनीतिक के साथ-साथ मूर्ति बनाने की राजनीतिक भी चरम पर है। इतिहास को याद करते करते न जाने कब इतिहास से ही बेईमानी करने वाली भारतीय राजनीति में चरित्र से ज्यादा चित्र महान है। स्कूल के समय में मास्टर जी बताया करते थे कि चित्र नही आपका चरित्र महान होनी चाहिए। लेकिन अब लगता है कि गुरूजी बिल्कुल गलत थे और भौतिकी को उल्टा समझा रहे थे। आज के समय में आपके चरित्रों की महानता आर्यभट्ट के शुन्य के बराबर हो चुका है, जबकि चित्र की महानता 1 से लेकर 9 तक है। ऐसे भी कोई किसी को शुन्य के बराबर नही आकता है।

जातीय राजनीतिक के दौर में कोई पीछे क्यों रहे, जहाँ बीजेपी ब्राह्मण वोट, वैश्य वोट, मोर्य वोट , दलित वोट को साधने में लगी है वही दूसरी पार्टी भी इस दौर में बीजेपी से आगे निकल पड़ी है। बहुजन समाज पार्टी के पूराना स्लोगन तो आपको याद होगा ही, अगर आप भूल गये है तो पुन: याद कर लेने की जरूरत है। क्योंकि बीएसपी आज कल प्रबुद्ध सम्मेलन कर रही है और उसमें ब्राह्मणों को लुभाने को पुरजोर कोशिश है। हालांकि यह बात भी सही है कि बीएसपी में मायावती के बाद जो हैसियत रखता है वह भी एक ब्राह्मण ही है। नाम से तो आप भली भांति परिचित होंगे ही, फिर मैं बता देता हूँ कि उनका नाम है सतीश मिश्र। लेकिन यह भी बहन जी ने साफ-साफ कह दिया है कि श्री मिश्रा बीएसपी के उत्तराधिकारी नही है। अब आप सोच सकते है कि जिस पार्टी में शीर्ष ब्राह्मण बैठा हो लेकिन वह उसके उत्तराधिकारी न हो तो आखिर कौन होगा बीएसपी में मायावती के उत्तराधिकारी। खैर यहाँ यह बात भी जान लेना जरूरी है कि जाति से जन्मा राजनीतिर जातीय सोच से बाहर निकलने का दम नही रखता है। स्लोंगन क्या था ? तिलक तराजू और तलवार इनकों मारों जुते चार। जिस पार्टी के मानसिकता इतनी गिरी हुई हो और उसी पार्टी में दुसरे नंबर पर एक तिलकधारी कुंडली मार के बैठा हो तो यह भी किसी चमत्कार से कम नही है।
सपा की मुस्लिम राजनीति को कौन नही जानता है। एक समय ऐसा भी था जब सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव को मुल्ला मुलायम के नाम से जाना जाता था। हालांकि यह कहना भी काफी हद तक सही होगा कि आज भी आम जन में यह शब्द काफी प्रचलित है। लड़के से गलती हो जाते है और गलती से लड़के हो जाते है। राजनीतिक इतिहास और वर्तमान में काफी सुना जाने वाला पंच लाईन है, जिसे उत्तर प्रदेश के चुनाव में काफी सुना जाता है। मुस्लिम के राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के बारे में माना जाता है कि वह सभी वर्गों के साथ ताल-मेल रखने मे विश्वार रखते है लेकिन जिस पार्टी का डीएनए ही सवर्ण विरोध और मुस्लिम समर्थन से शुरू किया गया हो उनका राजनीतिक विचारधारा इतना जल्दी बदलेगा यह कहना अतिश्योक्ति ही होगा।
एक तरफ अखिलेश यादव ब्राह्मण को खुश करने के लिए प्रबुद्ध सम्मेलन करने की तैयारी में है तो दूसरी तरफ उनके मुस्लिम नेता अबरार अहमद ब्राह्मण और राजपूत को चोटा और अपने आपको नबाब बताने के नही रूक रहे है। यह भी कह सकते है कि यह नेता अखिलेश यादव के डुबती नैया मे एक और छेद करके जल्दी से डुबाने में लगे है। गुर्जर समाज को लेकर चिंतित दिखने वाले अपने नेता के इस ब्यान पर खामोश है। लेकिन इसके बावजूद कुछ ब्राह्मण नेता इनके जी हजूरी करने में लगे है तो समझिये यह मात्र एक कलयुग के प्रकाष्ठा है ।

ब्राह्मण के सबसे ज्यादा करीब रहने वाले और ब्राह्मण को लगातार प्रतिनिधित्व देने वाली कांग्रेस पार्टी भी आजकल अपने वोट बैक को साधने में असफल रही है। प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के एक बड़ा चेहरा बीजेपी के दामन थाम लेता है और बीजेरपी भी उसे लगे हाथ मंत्रालय पकड़ाकर जातीय वोट बैंक को साधने में लग जाती है। हालांकि बीजेपी के साथ सवर्ण समाज शुरू से ही रही है। लेकिन आगामी चुनाव को देखते हुए जिस प्रकार से जातीय समीकरण बिठाए जा रहे है। इसका मतलब साफ साफ है कि राजनीति में चरित्र नाम की कोई चीज बची नही है।

एक समय था जब लोग जातीय अस्मिता बचाने के लिए किसी राजनीतिक पार्टी का सहारा लिया करते थे। लेकिन आज जिस प्रकार राजनीतिक जातीय गोटी बिछाने में, भ्रष्ट नेताओं को वोट बैंक के लिए नेतृत्व दिया जा रहा है। चिंता इस बात की नही कि वो लोग सत्ता में बैठ रहे है , चिंता इस बात की है कि भविष्य अपना नेता किसे मानेगा। उस चोर उचके बलात्कारी नेता को जो जातीय के नाम पर वोट मांगकर शीर्ष पर बैठ गया या फिर उसे जो जीवन भर भूखे प्यासे सेवा में गुजार दिया। भविष्य में लोग आदर्श किसे मानेंगे ? आज इतिहास इस बात को लेकर नही लिखा जा रहा है कि उसका व्यक्तित्व कितना अच्छा है। बल्कि इस बात को लेकर लिखा जा रहा है कि उसके पास धन, कितना है, उसने कितने मर्डर किये है, उसने बलात्कार के मामले में कितने साल की सजा काटा है। बलात्कारी मंत्री बन गया औऱ शरीफ उसके दरबारी। जातीय वोट बैंक साधने की यह दौर, क्या उस दौर से कम है जब देश आक्रमणकारियों से घिरा था और राजा रजबाड़ा और जनता अपने हित के लिए इस्लाम कबूल कर रहे थे। वोट बैंक की यह संघर्ष निश्चित ही किसी जातीय खुनी संघर्ष में बदलेगा और पूरे भारत में एक और महाभारत होगा। लेकिन उस महाभारत में कृष्ण कौन होगा और उसका स्वरूप कौन होगा। युद्ध लड़ रहे योद्धाओं को नैतिक ज्ञान कौन देगा। अनैतिक कारण से जन्मा यह युद्ध मानव जाति के लिए एक भयंकर प्रलय से हजारों गुणा दुखदायी हो ऐसा भी संभव है। इसका एक झलक आप अफगानिस्तान और तालिबान को देखकर समझ सकते है।

हर कोई जातीय इतिहास को निकालकर जिस प्रकार से मुर्ति बनाने के दौर मे लगा है, उससे तो लगता है कि उस महापुरुष का सम्मान कम और अपमान ज्यादा होने लगा है। जातीय महापुरुष की कथा के कारण ही देश को आरक्षण नामक दंश झेलना पड़ रहा है।

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