राजीतिक भ्रष्टाचार: दिल्ली एनसीआर मे अतिक्रमण और प्लानिंग बोर्ड

समाज जागरण दिल्ली

ज़िन्दगी कैसी है पहेली हाय
कभी तो हँसाए, कभी ये रुलाये

कभी देखो मन नहीं जागे
पीछे-पीछे सपनों के भागे
एक दिन सपनों का राही
चला जाये सपनों से आगे कहाँ
ज़िन्दगी कैसी है पहेली…

मन्नाडे के स्वर में यह गीत आज भी जिंदगी की पहेलियों को सुलझाने में लगा है, योगेश के धारदार कलम से लिखे इस गीत को सलील चौधरी नें संगीत दिया है, जो कि राजेश खन्ना फिल्म आनन्द में फिल्माया गया है।
खैर आप सोच रहे होंगे कि मै इस गाने की बात शुरुआत मे ही क्यो कर दी। तो मै आपको बताना चाहता हूँ कि आज इस संपादकीय के मुख्य बिन्दू में पहेली है। जिस जगह कि मै बात करने जा रहा हूँ वह है दिल्ली। यानि कि हम दिल्ली की अन्सुलझे पहेली को सुलझाने की कोशिश करने की कोशिश करेंगे। बता दे कि दिल्ली में एक मंत्रालय है आवास विकास मंत्रालय, उसके अधीन एक संस्था है एनसीआरपीबी जिसका काम शहर को सुन्दर बनाने के लिए प्लानिंग करना है और उस पर निगरानी रखना है। लेकिन अफसोस कि यह बोर्ड एक डाक विभाग से ज्यादा कुछ नही है। ऐसा क्यों है यह भी आपको इसी आर्टिकल में पढ़ने को मिलेगा।

1947 में दिल्ली की आबादी 10 लाख थी और यह देश के राजधानी के रूप में विकसित किया गया। अंग्रेजो ने कलकता के बाद इस शहर को अपना आशियाना बनाया था। लेकिन आज इस दिल्ली की आबादी 2.5 करोड़ से ज्यादा की है। यही कि 10 लाख की आबादी वाली दिल्ली 26 गुणा ज्यादा आबादी की बोझ ढो रहा है। दिल्ली के इसी बोझ को कम करने के लिए एनसीआर का गठन किया गया। इसके मुताबिक दिल्ली के 100-150 किलोमीटर के दायरे में औद्योगिक क्षेत्र का विकास करना और इस शहर के उद्योग को बाहर शिफ्ट करना था। जिसमें राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कुछ जिले को शामिल किया गया। दिल्ली से लगभग सारे उद्योग भी शिफ्ट कर दिये गए और लोग भी, लेकिन दिल्ली का आबादी वाला बोझ बढ़ता ही चला गया। 1971 से लेकर 1981 के बीच में अचानक दिल्ली में जनसंख्या विस्फोट हुआ। इस दौरान जनसंख्या में 53% की वृद्धि हुई। इसके बाद से हर बार की जनगणना में 52% प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी। हालांकि यह 2001 से 2011 के बीच में 26 प्रतिशत के आकड़े को प्राप्त किया है।

1961 में केन्द्रिय गृहमंत्री के अधीन उच्चाधिकार प्राप्त बोर्ड की स्थापना की गई। 1962 में दिल्ली के लिए मास्टर प्लान बना जो कि सिर्फ दिल्ली क्षेत्र के लिए था। 1973 में केन्द्रिय निर्माण और आवास मंत्री के अधीन पुनर्गठित उच्चाधिकार प्राप्त बोर्ड बनाया गया। 1971 से 1981 के जनसंख्या विस्फोट को देखते हुए 1985 में केन्द्रिय संसद नें राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र योजना बोर्ड अधिनियम बनाकर इसके लिए दिशा निर्देश निर्धारित की गयी। जिसके अनुसार सभी एनसीआर में शामिल सभी प्रदेश के मुख्यमंत्री इसका सदस्य होते है।

लगातार बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए 1996 में एनसीआरपीबी का गठन किया गया। जिसका काम शहरी जीवन को बेहतर बनाना था। लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि यह बोर्ड एक डाकिया से ज्यादा कुछ नही किया। आज राजधानी दिल्ली की हालत किसी देहाती क्षेत्र से ज्यादा नही है। यह हालात सिर्फ दिल्ली की नही बल्कि दिल्ली पूरे दिल्ली एनसीआर की है। एक तरफ जहाँ बंग्लादेशील और रोहिग्या देश के राजधानी में तांडव कर रहे है, वही दूसरी तरफ अवैध कब्जा कर स्कूल कालेज माॅल बना लिया गया है। राजनीतिक संरक्षण मे बने अवैध बस्ती में जहाँ अराजक तत्व पनप रहे है वही राजनीतिक लाभ की सारी गाड़ियाँ यह चारों तरफ भटकते है रहते है। सरकार के द्वारा दिए जा रहे स्कीम का 60 प्रतिशत हिस्सा इन अवैध कालोंनियों में वितरित कर वोट बैक हासिल किया जा रहा है तो 40 प्रतिशत इन अवैध कालोंनी के नेताओं के जेब मेे जाते है।

धराधर बनती अवैध कालोनी और बेखबर एनसीआर प्लानिंग बोर्ड कभी जबाब तलब नही करते कि आखिर ऐसा क्यो किया जा रहा है ? कुछ समाजसेवियों का तो यह भी मानना है कि इसे अवैध कहने के बजाय वैध कालोनी बनाकर, इनसे हाउस टैक्स वसूल किया जाय। क्योंकि अवैध कालोंनी में पानी बिजली सब फ्रि है, बस हाउस टैक्स नही देते है। अवैध कब्जा करके बनाए गए झुग्गी बस्ती को किराये पर लगाकर इनके मालिक कोठियों में आराम की नींद लेते है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट नें हरियाणा सरकार को हर हाल में अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया और कहा था कि हर हाल में हटनी चाहिए। हरियाणा सरकार नें बुल्डोजर भी चलाया। सूरजकुंड के पास 10 किलोंमीटर के क्षेत्र को खाली करवाया गया। उसके बाद शांत कारण वहाँ पर होटल बन रहा है और किसी बड़े होटल के सामने झुग्गी बस्ती उस राज्य सरकार के वास्तविकता को दर्शाता है। या कोई भी होटल के मालिक नही चाहेगा कि उसके होटल के सामने राजू का ढाबा खुला हो।
इस वर्ष 23 जुलाई को फरीदाबाद के खोरी गांव में अवैध निर्माण के मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट नें कहा था कि वन भूमि पर स्थित सभी ढांचों को हटाने का हमारा निर्देश बिना किसी अपवाद के सभी पर लागू होगा। इसी मामले के तहत 129 फार्म हाउस , बैक्वेट हाल, धार्मिक स्थलों को ध्वस्त करना अभी बांकि है। लेकिन हरियाणा सरकार ने अपना हाथ खड़ा कर दिया।
हरियाणा सरकार नें खोरी में अवैध निर्माण गिराने के मामले में जो जबाब दायर किया है यह कोई नयी बात तो नही है। क्योंकि ऐसा तो होना ही था। कम से कम हरियाणा सरकार नें इस मामले में सच तो बोला। हरियाणा सरकार नें माननीय न्यायालय में हलफनामा दाखिल किया जिसमें कानून व्यवस्था की गंभीर समस्या होने और हरियाणा सरकार के क्षमता से बाहर की बात बताते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया है।

अतिक्रमण को हटाना कानून व्यवस्था से ज्यादा वोट बैंक के लिए घातक
इस देश की समस्या अतिक्रमण हटाना और उससे कानून व्यवस्था बिगड़ना नही है। योगी सरकार नें दिल्ली में घुसकर रोहिंग्या के द्वारा अतिक्रमण किया गया कृषि भूमि को खाली करवा लिया लेकिन कोई कानून व्यवस्था नही बिगड़ा। हालांकि स्थानीय नेता ने कानून व्यवस्था बिगाड़ने की कोशिश जरूरी की थी। लेकिन दोनो तरफ की पुलिस भारतीय जनता पार्टी के सरकार के अधीन है।
सबसे पहले हमे यह सोचना होगा कि अतिक्रमण होते क्यो है ? अतिक्रमण के पीछे राजनीतिक सांठ गांठ है। पहले अपना वोट लेने के चाह में स्थानीय नेताओं के द्वारा अतिक्रमण करवाये जाते है। इस बीच में पूरे शासनिक और प्रशासनिक अमला को निष्क्रिय कर दिया जाता है, जो इस अतिक्रमण को हटाने की कोशिश करे उसको रास्ते से हटा दिया जाता है। क्योंकि किसी भी सरकार के लिए कानून व्यवस्था से ज्यादा महत्व उसका वोट बैंक है। इन झुग्गी झोपड़ी में रहने वालों के लिए जल्द से जल्द राशन कार्ड, वोटर आईडी बना दिये जाते है वह भी स्थानीय नेताओं के मदद से। शत प्रतिशत वोटिंग भी यहीं से किये जाते है। सरकारी योजनाओं का लाभ भी सबसे ज्यादा यही मिलते है। भले ही कानून व्यवस्था खराब हो लेकिन वोट बैंक कौन खराब करना चाहेगा।
यही कारण है कि हरियाणा सरकार नें अतिक्रमण हटाने के मामले में अपना हाथ खड़ा कर दिया है, संभवत: माननीय न्यायालय भी इसे कानून व्यवस्था के मजबूरी समझकर मामला को बंद कर देेंगे। सरकार किसी का भी अतिक्रमण अपने चरम सीमा पर होते है। दिल्ली में 1960 में जिस डीडीए का गठन किया गया वह आज तक सक्रिय भूमिका नही निभाया है। उसके बाद एनसीआर प्लानिंग बोर्ड का गठन किया गया लेकिन उनका काम भी चिट्ठियों को यहाँ से वहाँ भेजना रह गया। दिल्ली मे डीडीए, वन विभाग और भारतीय पुरातत्व विभाग के जमीन पर भी कब्जा कर लिया और उस पर जामिया मिलिया और बजीरपुर जैसे झुग्गियों का निर्माण कराया गया है। दिल्ली के सैनिक फार्म के बारे में तो आपने सुना ही होगा। यह दुनिया के सबसे अमीर झुग्गियों में से एक है। भले ही यह दिल्ली के बीचों बीच में नही है लेकिन इसकी संदिग्धता इससे कम नही होता है। रात के समय में यहाँ महंगी से महंगी गाड़ी खड़ी होती है। इसे झुग्गी हमने इसलिए कहा क्योंकि यह अवैध तरीके से बनाया गया एक फार्म हाउस है। हरियाणा सरकार भी अगर बुल्डोजर चलाती है तो ऐसे न जाने कितने फार्म हाउस उसके जद में आयेंगे। अब राजनीतिक के लिए धन की आवश्यकता भी तो है और धन इन्ही अवैध धंधा और कारोबार से मिलते है भला कोई ईमानदार बिजनसमैन कितना दे देगा।

अगर एनसीआरपीबी की बात करे तो आपको पता होगा कि नोएडा में कितना बड़ा भूमि घोटाला किया गया। प्लानिंग बोर्ड के नियमों को ताक पर रखकर भूमि उपयोग में बदलाव किया गया और उसे बिल्डर को बेच दिया गया। उसके बाद मामला कोर्ट में पहुँचा और कोर्ट नें जांच की आदेश दिया। 2012 में मास्टर प्लान रिवाईज्ड किया गया, और उसमें 20-25 धर गरीब लोगों के लिए बनाने की अनुशंसा की गई। ऐसा मकान जिसमें इंडस्ट्रीयल मजदूर लोग कम किराया देकर या फिर खरीदकर रह सके। लेकिन बिल्डर इन प्लान का भी फायदा उठाकर अतिरिक्त एफएआऱ लिया औऱ उसे भी फ्लैट बनाकर बेच दिया गया। प्लान के हिसाब से लगभग 2 लाख मकान बनने थे। जो कि 6-8 लाख की आबादी वाले नोएडा शहर में काफी था और किसी को भी झुग्गी बनाने की जरूरत नही होती। लेकिन यह भी राजनीतिक के भेट चढ गया और राजनीतिक चंदा ले लिया गया। आज भी लाखो घर खरीदार अपने ही घर प्राप्त करने के लिए नेताओं के आगे पीछे घुमने को मजबूर है।

मैने इन सबके जरिये दिल्ली एनसीआरपीबी का पहेल सुलझाने की कोशिश की है लेकिन अगर फिर भी समझ मेे नही आया हो तो यही गुनगुनाईये
ज़िन्दगी कैसी है पहेली हाय
कभी तो हँसाए, कभी ये रुलाये

कभी देखो मन नहीं जागे
पीछे-पीछे सपनों के भागे
एक दिन सपनों का राही
चला जाये सपनों से आगे कहाँ
ज़िन्दगी कैसी है पहेली…

जिन्होंने सजाये यहाँ मेले
सुख-दुःख संग-संग झेले
वही चुनकर खामोशी
यूँ चले जाएँ अकेले कहाँ
ज़िन्दगी कैसी है पहेली..

वतन की आवाज
vatankiawaz@gmail.com
@vatankiawaz

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