कमजोरों में जो सबसे कमजोर हैं उनको आरक्षण का फायदा पहुंचाने के लिए जरूरी है जाति जनगणना

जाति-जनगणना से इनकार करना इंसाफ-पसंद समाज होने से इनकार करना है

बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार की अगुवाई में विपक्षी दलों की मांग के बाद सवाल यह है ही नहीं कि जातियों की गिनती हो या नहीं। सवाल इतना भर बचा है कि हम एक इंसाफ-पसंद समाज बनना चाहते हैं या नहीं। जातियों की गिनती ना करने का या उसे किसी तकनीकी कारण से उलझाये रखने का मतलब है इंसाफ के निर्णायक मौके को किसी और वक्त के लिए टाल देना और ये बात यहां दोहराने की जरुरत नहीं कि इंसाफ को टालना दरअसल तो इंसाफ से इनकार करने के बराबर होता है।

नई जनगणना होने को है तो शिक्षा तथा नौकरियों में वंचित तबके के लोगों के लिए आरक्षण की व्यवस्था को न्यायसंगत बनाने का देश के सामने अभी ऐतिहासिक मौका है। यह मौका आया है अगस्त के पहले हफ्ते में लोकसभा और राज्यसभा में पारित 127वें संविधान संशोधन विधेयक (यानि ओबीसी बिल) के पारित होने से।

इस विधेयक के जरिए राज्यों को अधिकार मिल गया है कि वे सामाजिक और शैक्षिक रुप से पिछड़े (SEBCs) जाति समूहों की पहचान करें और जरुरत समझें तो उस जाति-विशेष को सामाजिक न्याय का हकदार मानते हुए राज्य की ओबीसी सूची में शामिल करें।

ऐतिहासिक मौका

राज्यों का यह अधिकार हाल में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद सवालों के घेरे में आ गया था। मराठा कोटा-केस में सुप्रीम कोर्ट ने 3:2 के बहुमत से फैसला सुनाया कि संविधान के 102वें संशोधन के बाद राज्य सरकारों के पास सामाजिक और शैक्षिक रुप से पिछड़े तबके की पहचान और उन्हें आरक्षण का लाभ देने के लिए अपनी ओबीसी सूची में शामिल करने का अधिकार नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक ऐसा करने का अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति के पास है। केंद्र सरकार का मानना था कि संविधान का 102वां संशोधन राज्यों के ऐसे अधिकार को बाधित नहीं करता। केंद्र सरकार ने संविधान के 102वें संशोधन की न्यायिक पुनर्व्याख्या के लिए एक रिव्यू पिटीशन डाला लेकिन याचिका खारिज हो गई।

इसी के बाद केंद्र सरकार 127वां संविधान संशोधन विधेयक(प्रचलित भाषा में ओबीसी बिल) लेकर आयी। इस विधेयक में संविधान के अनुच्छेद 342A में संशोधन का प्रस्ताव किया गया है। प्रस्ताव के मुताबिक केंद्र सरकार की ओबीसी सूची के लिए सामाजिक और शैक्षिक रुप से पिछड़ी किसी जाति को शामिल करने का अधिकार राष्ट्रपति को होगा।

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साथ ही, संशोधन में यह भी प्रस्ताव किया गया कि अनुच्छेद 342A में एक उपबंध(3) जोड़ा जाय जो स्पष्ट करता है कि केंद्र और राज्य दोनों ही को अपने उद्देश्यों के निमित्त सामाजिक और शैक्षिक रुप से पिछड़े वर्ग के समूहों की पहचान और उन्हें इससे संबंधित सूची में शामिल करने का अधिकार होगा और यह भी कि राज्यों की ऐसी सूची केंद्र सरकार की सूची से अलग हो सकती है।

मतलब, बिल अगर कानून के रुप में अमल में आता है तो जहां शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण के लिए जाट-आंदोलन मजबूत है वहां जाट समुदाय को और जहां इसके लिए मराठा-आंदोलन मजबूत है वहां मराठा जाति को राज्य सरकार चाहे तो अब बिना किसी कानूनी अड़चन के अपने राज्य की ओबीसी सूची में शामिल कर सकती है।

(ऐसे ही, अगर किसी सूबे की सरकार को लगता है कि अबतक सामान्य श्रेणी मे माना जाने वाला कोई तबका, जैसे यूपी में कायस्थ, ओबीसी सूची में शामिल होने लायक है, तो वह ऐसा कर सकती है)। लेकिन ऐसा लगना भर या आंदोलन-मात्र तो किसी जाति-विशेष को आरक्षण का हकदार मानने की जायज वजह नहीं हो सकता। ये देखना पड़ेगा कि आरक्षण की मांग करने वाली जाति अन्य जाति-समूहों की तुलना में सामाजिक और शैक्षिक रुप से पिछड़ी हुई है कि नहीं।
यह काम बगैर जाति-जनगणना के नहीं हो सकता क्योंकि सन् 1931 की जनगणना के बाद से आज दिन तक ऐसा कोई पुख्ता आंकड़ा देश के सामने मौजूद नहीं जिसके आधार पर साफ-साफ कहा जा सके कि ओबीसी समुदाय के रुप में चिन्हित फलां जाति सामाजिक और शैक्षिक रुप से किस हद तक वंचित है या फिर यही कि ओबीसी-आरक्षण के लागू होने के बाद के सालों में इस बड़े समुदाय के भीतर ऐसी कौन-कौन सी जातियां हैं जिसके सदस्यों को आरक्षण में निर्धारित कोटे (27 प्रतिशत) का फायदा ओबीसी में शामिल किसी अन्य जाति की तुलना में समान रुप से ना मिल पाया ताकि उसके लिए कोटे के भीतर विशेष रुप से कोटे की व्यवस्था की जा सके।

आरक्षण की बदलती हुई धारणा

जातियों की सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक दशा की गिनती एक और अहम वजह से भी जरुरी है। नीति-निर्माण के स्तर पर ये विचार जोर पकड़ रहा है कि अभी जो एसएसी-एसटी (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति) और एसईबीसी (सामाजिक तथा शैक्षिक रुप से पिछड़े यानि ओबीसी) को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण प्राप्त है उसका फायदा इन समुदायों में शामिल तमाम जातियों के लोगों को समान रुप से नहीं हो रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो शिक्षा और नौकरियों में कोटे की व्यवस्था खुद आरक्षण-प्राप्त तबके में गैर-बराबरी का कारण बन रही है।

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इस बात की पहचान करते हुए पिछले साल अगस्त माह के आखिर में आये एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की एक बेंच ने कहा था कि राज्य चाहें तो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की केंद्रीय सूची को जातियों की उप-श्रेणियों में बांट सकते हैं ताकि `कमजोरों में जो सबसे ज्यादा कमजोर` हैं उनके साथ सामाजिक न्याय के सिद्धांत का पालन करते हुए तरजीही बरताव किया जा सके।

जस्टिस अरुण मिश्र की अगुवाई वाली बेंच ने अपने फैसले में साफ कहा कि “जब आरक्षण खुद ही आरक्षण-प्राप्त जातियों के बीच गैर-बराबरी पैदा कर रहा हो तो राजसत्ता को चाहिए कि वह उप-श्रेणियां(आरक्षण प्राप्त तबके में जातियों की) बनाये ताकि राजसत्ता के जरिए पहुंचाये जा रहे फायदे सिर्फ कुछ हाथों में सिमटकर ना रह जाये और सबके साथ बराबरी का इंसाफ हो।”
दूसरे शब्दों में कहें तो सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले में एससी-एसटी तबके में `क्रीमी लेयर` की युक्ति लागू करने और दलितों के बीच महादलित की पहचान कर उसे हासिल कोटे के दायरे में विशेष कोटा देने की सोच को हामी भरी।

इसी सोच (कि कमजोरों के बीच जो सर्वाधिक कमजोर है, आरक्षण में उसका हक पहला) से ओबीसी तबके के लिए केंद्र सरकार ने रोहिणी आयोग का गठन (साल 2017) किया। जस्टिस जी. रोहिणी की अध्यक्षता में बने इस आयोग के कार्यकाल का पिछले साल नवीं बार विस्तार किया गया था। इस आयोग को ये सुझाव देने का जिम्मा दिया गया है कि केंद्र सरकार ओबीसी को मिले 27 प्रतिशत कोटे को किस तरह अलग-अलग उपश्रेणियों के बीच बांटे और ये भी बताये कि क्या ऐसा करना जरुरी है।

ध्यान देने की बात है कि ओबीसी एक बहुत बड़ा समुदाय है और इसकी केंद्रीय सूची में हजारों जातियां-उपजातियां शामिल हैं। इसमें एक तरफ वोक्कालिंगा (कर्नाटक), कुनबी (महाराष्ट्र), यादव और कुर्मी (बिहार, यूपी) जैसी भूस्वामी जातियां शामिल हैं तो दूसरी तरफ ऐसी जातियां भी जिन्हें परंपरागत तौर पर कारीगर माना जाता है (जैसे जुलाहा,लोहार और बढ़ई)। ओबीसी तबके में एक तरफ हम नाई, धोबी जैसी परंपरागत रुप से सेवा-कार्य से जुड़ी जातियां देखते हैं तो ऐसी जातियां भी जिन्हें खानाबदोश (घुमंतू) कहा जाता है और परंपरागत रुप से सर्वाधिक लांछित (अपराध-कर्म में लिप्त) माना जाता है।

अगर ओबीसी समुदाय में एक तरफ भूस्वामी जातियां हैं और दूसरी तरफ धोबी, नाई या घुमन्तू जातियां तो फिर सहज ही समझा जा सकता है कि 27 प्रतिशत के कोटे के लिए इस समुदाय के सदस्यों के बीच आपसी प्रतस्पर्धां बराबर की ना होगी और कोटे का ज्यादातर हिस्सा ओबीसी के भीतर उन जातियों के सदस्यों के हिस्से जायेगा जो ओबीसी के दायरे में अन्यों की तुलना में तनिक बेहतर स्थिति में हैं।

सवाल यह है कि अगर रोहिणी आयोग ओबीसी के दायरे में आने वाली सर्वाधिक पिछड़ी जातियों को क्रमवार कुछ उप-श्रेणियों में बांटता है और कमजोरों के बीच सर्वाधिक कमजोर के तर्क से सबसे ज्यादा पिछड़े को 27 प्रतिशत के कोटे के भीतर एक निश्चित कोटा देने का सुझाव देता है तो आयोग ऐसा किस आंकड़ों को आधार बनाकर करेगा।

एससी-एसटी के मामले में महादलित की श्रेणी बनाकर विशेष कोटे की व्यवस्था की जाती है या क्रीमी लेयर की युक्ति लागू की जाती है तो इसमें जनगणना के आंकड़े मददगार हो सकते हैं क्योंकि जनगणना में सिर्फ यही गिना जाता कि कोई व्यक्ति एससी या एसटी समुदाय का है बल्कि यह भी दर्ज किया जाता है कि कोई व्यक्ति अगर एसटी या एसटी समुदाय का है तो वह किस जाति या जनजाति का है और उसकी आर्थिक दशा(जैसे कच्चे मकान में रहता है या पक्के मकान में, भूमिहीन है या खेतिहर मजदूर, अनपढ़ है या पढ़ा लिखा आदि) कैसी है।

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मिसाल के लिए अगर आप जानना चाहें कि एससी तबके में शामिल किस जाति के सदस्य इस तबके की अन्य जाति के सदस्यों की तुलना में आरक्षण के लाभ हासिल कर पाने में कमजोर साबित हुए हैं तो ऐसा 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर किया जा सकता है।
मसलन, साल 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक देश में साक्षरता दर 74 फीसद की है लेकिन बिहार में डोम जाति के लोगों के बीच साक्षरता दर 16 प्रतिशत और मुसहर जाति के लोगों के बीच साक्षरता दर महज 9 प्रतिशत की है. बिहार में मुसहर जाति के लोगों की तादाद 20 लाख से ज्यादा है लेकिन इनमें ग्रेजुएट लोगों की तादाद सिर्फ 2000 यानि 0.1 प्रतिशत है।

इसी तरह जनगणना के आंकड़ों के सहारे यह बताया जा सकता है कि पूर्वोत्तर के एसटी वर्ग के लोग छत्तीसगढ़ के एसटी वर्ग के लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा बेहतर स्थिति में हैं और उन्हें आरक्षण का फायदा छत्तीसगढ़ या ओड़िशा के एसटी तबके की तुलना में ज्यादा पहुंचा है।

लेकिन यह जानना हो कि आरक्षण का लाभ ओबीसी के तबके के भीतर ज्यादातर जातियों को समान रुप से पहुंचा है या नहीं या इस तबके के भीतर कौन सी जातियां अपनी विशेष कमजोर स्थिति के कारण 27 प्रतिशत के कोटे के भीतर विशेष कोटे की हकदार हो सकती हैं तो जनगणना के आंकड़े मददगार नहीं हो सकते क्योंकि ओबीसी तबके की ऐसी कोई गिनती होती ही नहीं।

हां, राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण या फिर राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़े जरुर मौजूद हैं लेकिन इन आंकड़ों के आधार पर हम एससी-एसटी या ओबीसी की कुल संख्या का अनुमान तो लगा सकते हैं लेकिन जातिवार सामाजिक-शैक्षिण दशा के बारे में ठीक-ठीक नहीं जान सकते।

ओबीसी समुदाय में शामिल जातियों की शैक्षिक और सामाजिक दशा को जानने के लिए जनगणना में उनकी गिनती करना एक और कारण से भी जरुरी है।

प्रसिद्ध इंद्रा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की अधिकतम सीमा का ही निर्धारण नहीं किया था बल्कि उसमें सामाजिक पिछड़ेपन की पहचान के 11 संकेतक बताये गये थे और यह भी कहा गया था कि मंडल कमीशन के हाथो हुई पिछड़े वर्ग की पहचान अंतरिम ही है अंतिम नहीं, उसके साथ ऐसी कोई मुहर नहीं लगी कि वही फायनल है।

कोर्ट ने ध्यान दिलाया था कि मंडल आयोग ने खुद ही रिपोर्ट के तेरहवें अध्याय में कहा है कि इस पूरी (ओबीसी आरक्षण) व्यवस्था का 20 सालों पर पुनरावलोकन किया जाये।

सो, सरकार के ऊपर है कि वह आरक्षण के लिए तैयार जातियों की सूची की किसी भी समय समीक्षा करे और अगर कोई जाति या समुदाय सूची में गैर-वाजिब ढंग से शामिल हो गया हो तो उसे निकालने का फैसला करे या फिर सरकार को लगे कि कोई जाति या समुदाय सामाजिक रुप से पिछड़ा होने के बावजूद इस सूची में शामिल नहीं हो सका है तो उसे शामिल करने के जतन करे। सरकार के ऐसा करने के लिए जो आंकड़े जरुरी होंगे वे जाति-जनगणना से ही आ सकते हैं।

आरक्षण की अधिकतम सीमा बदलने का डर

आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था के विरोधी बहुतों को यह डर सता सकता है(और इसी तरह आरक्षण के समर्थक बहुतों को लुभा सकता है) कि जाति-जनगणना से अधिकतम आरक्षण की सीमा बढ़ सकती है।

इस भ्रांत धारणा से उबारे के लिए मराठा कोटा-केस में आये सुप्रीम कोर्ट के फैसले को फिर से पढ़ लेना ठीक होगा। मराठा कोटा-केस में जस्टिस अशोक भूषण की अगुवाई वाली खंडपीठ ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार ने मराठा समुदाय को(16 प्रतिशत) आरक्षण देने के लिए कानून बनाकर अधिकतम आरक्षण की 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन किया सो, ऐसा कानून असंवैधानिक है।

सुप्रीम कोर्ट का मानना था कि राज्य में ऐसी कोई “असामान्य स्थिति” पैदा नहीं हुई थी कि 50 प्रतिशत (आरक्षण) की अधिकतम सीमा लांघने की जरुरत हो। कोर्ट ने अपने फैसले में जस्टिस एन.जी गायकवाड कमीशन के उन निष्कर्षों को दोषपूर्ण करार दिया जिसके आधार पर मराठा कोटा कानून बना था और बाम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले को भी दोषपूर्ण माना जिसमें महाराष्ट्र स्टेट रिजर्वेशन फॉर सोशली एंड एजुकेशनवी बैकवार्ड क्लासेज एक्ट (2018) यानि मराठा कोटा कानून को जायज ठहराया गया था। गायकवाड़ कमीशन ने मराठा समुदाय को शिक्षा और नौकरी में 16 प्रतिशत का आरक्षण देने की बात कही थी।

बाम्बे हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इसे घटा( शिक्षा में 12 प्रतिशत और नौकरी में 13 प्रतिशत) दिया लेकिन राज्य में मराठा समुदाय के लोगों को 50 प्रतिशत की अधिकतम सीमा लांघते हुए आरक्षण देने के कानून को जायज माना। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने मराठा कोटा-केस पर सुनाये फैसले में कहा कि आरक्षण का प्रतिशत घटा देने के बावजूद कानून विधि-सम्मत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक मराठा समुदाय को अलग से आरक्षण देना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21( सम्यक विधायी प्रक्रिया) का उल्लंघन है।

जस्टिस अशोक भूषण की अगुवाई वाली खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि इंद्रा साहनी मामले में सुनाये गये फैसले (आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत) पर पुनर्विचार करने या फिर उसे विचार के लिए बड़ी बेंच को सौंपने की जरुरत नहीं क्योंकि इंद्रा साहनी मामले में दिये गये फैसले को कम से कम चार बड़े फैसलों में सही माना गया है।

इंद्रा साहनी मामले में नौ जजों की बेंच ने शिक्षा तथा नौकरियों में 50 प्रतिशत तक के आरक्षण को अधिकतम सीमा करार दिया था बशर्ते कि इस सीमा को पार करके ज्यादा आरक्षण देने की कोई “अति विशिष्ट स्थिति” पैदा ना हो जाये।

ये बात ठीक है कि तमिलनाडु (और महाराष्ट्र) जैसे राज्यों ने इस लक्ष्मण रेखा को लांघा है या ऐसी कोशिश की है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी सच्चाई के मद्देनजर मराठा कोटा-केस का दायरा विस्तृत करते हुए उसमें अन्य राज्यों को शामिल किया और राज्यों से कहा आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से ज्यादा हो या नहीं इसे लेकर अपना पक्ष स्पष्ट करें।

विपक्षी दलों की मांग, संसद में पास विधेयक और आरक्षण की व्यवस्था को लेकर आये कोर्ट के फैसलों का तकाजा है कि सामाजिक न्याय के सिद्धांत को युक्तिसंगत बनाने और कमजोरों के भीतर सर्वाधिक कमजोर को वाजिब हक देने के लिए जाति-जनगणना हो। जाति-जनगणना से इनकार करना इंसाफ-पसंद समाज होने से इनकार करना है।

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