दादागिरी से किरकिरी तक

-राजेश बैरागी-
तीनों कृषि कानून कितने काले थे, इसपर पिछले एक वर्ष से अगले कई वर्षों तक बहस जारी रह सकती है। यदि उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में चुनाव न होते तो सरकार अभी और लंबे समय तक किसान आंदोलन को झेलने की स्थिति में थी। लोकतंत्र की शक्ति का अनुभव ऐसे ही अवसरों पर होता है जब सरकार के एक ओर कुआं और दूसरी ओर खाई की सिचुएशन बन जाती है। सरकार जिस प्रकार इन कानूनों को लेकर आई थी और आज जिस प्रकार इन्हें वापस ले लिया गया, इस बीच दादागिरी से किरकिरी तक का सफर तय किया गया।अनेक किसानों की मौत और एक वर्ष तक दिल्ली के मुख्य प्रवेश मार्गों पर किसानों के कब्जे से स्थिति बेहद जटिल बन गई थी।आज उत्तर भारत में किसान नेताओं के लिए लोहड़ी, बैसाखी, होली, दीवाली,15 अगस्त और 26 जनवरी सबकुछ है। अपने चिरपरिचित अंदाज में आज सुबह जब प्रधानमंत्री ने स्वयं दूरदर्शन पर उपस्थित होकर अकस्मात तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की तो यह अप्रत्याशित तो नहीं परंतु आश्चर्यजनक अवश्य था।उसी समय एक व्यापारी मित्र ने फोन कर कहा,-निकल गई सारी हेकड़ी।’ हालांकि उन्होंने कहा कि स्वयं प्रधानमंत्री को यह घोषणा नहीं करनी चाहिए थी। दरअसल हम एक ही समय अपने प्रधानमंत्री को प्रस्तर से सशक्त और हृदय से नरम देखना चाहते हैं। परंतु अधिकांश विपक्ष प्रधानमंत्री को झुका देखना चाहता था। प्रधानमंत्री झुक गये। आगामी चुनावों ने उन्हें अकड़े रहने से रोक दिया। मेरी आर्थिक गतिविधियों में जानकारी सीमित है। छोटे व्यापारी इस सरकार पर बड़े व्यापारियों को लाभ पहुंचाने और छोटे व्यापारियों का गला रेत देने का आरोप लगाते हैं।उनका मानना है कि यह सरकार बाजार को कुछ बड़े व्यापारियों के हाथों में सौंपकर छोटे व्यापारियों को नौकर बना देना चाहती है। उनके दावों के लिए उनके पास आधार भी होंगे। हालांकि कथित हिंदुत्व की रक्षा और मुस्लिम समुदाय को नियंत्रित रखने के लिए उन्हें फिर मोदी और योगी की ही दरकार है। क्या तीनों कृषि कानूनों की वापसी से कई राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों में भाजपा को लाभ होगा? हिंदू मुस्लिम की रार के बगैर क्या कोई चुनाव जीता जा सकता है?(नेक दृष्टि हिंदी साप्ताहिक नौएडा)

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