*साधना पथ*

*भाग 3*

साधको एक समय अर्थात एक बार जिसका गोस्वामी बाबा निश्चय नही करते कि कब ऐसा घटित हुआ ।यद्यपि यह घटना त्रेतायुग की है पर निश्चित अवधि का संकेत नही किया गया है । अन्य ग्रन्थो के अनुसार श्रीराम विवाह के बारह वर्ष के पश्चात अर्थात तेरहवें वर्ष मे यह विलक्षण घटना घटित होती है । वैसे तो राजा दशरथ राजसभा मे दर्पण नही देखते थे किन्तु एक बार ऐसा संयोग हो जाता है कि –
*एक समय सब सहित समाजा ।*
*राज सभा रघुराज विराजा ।।*
*राय सुभाय मुकुर कर लीन्हा ।*
*बदन बिलोकि मुकुट सम कीन्हा ।।*
साधको , महराज दशरथ ने सहज भाव से दर्पण हाथ मे लेकर उसमें अपना मुख देखा । मस्तक मे शोभित विषम मुकुट को सम किया । भावी बस उसी समय उनकी दृष्टि कानो के समीप श्वेत केशो पर पडी़ । समझ गये कि यह श्वेत केश उनकी वृद्धावस्था का संकेत दे रहे हैं ।मानो श्वेत केश कह रहे हो कि अब आप वृद्ध हो गये है अतः अवध का सिंहासन युवा पुत्र श्रीराम को सौंप दे ।तात्पर्य यह है कि श्वेत केशो ने राजा दशरथ को मानो उपदेश दे दिया कि अब समय आ गया है जब उन्हे श्रीराम को युवराज पद देकर शेष जीवन भगवान के भजन मे लगाना चाहिये ।
साधको संसार के सभी बुजुर्गो को रामायण के इस प्रसंग से सीख लेनी चाहिये कि मुकुट टेढा हो तो जवान संतान को मुकुट सौंप देना चाहिये नही तो संतान जबर्दस्ती मुकुट छीन कर अपने शिर पर रख लेगी । हमारे शरीर के अंग प्रत्यंग समय समय पर हमे संदेश देते है कि सम्भल जाओ । लेकिन हम दाँत टूटे तो नकली दाँत , बाल सफेद हुये तो खिजाब लगाकर उस संदेश को अनसुना कर देते हैं । जबकि दाँत गिरकर हमे यह संदेश देता है बहुत स्वाद ले लिया , अब सम्भल जाओ , परन्तु हम सुनते कहाँ हैं ? उसी प्रकार बाल जब सफेद होने लगे तो सम्भल जाओ । साधको , मेरे कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि सफेद बाल हो तो व्यक्ति निवृत्ति का निर्णय ले ।निवृत्ति का अर्थ भागना नही है घर मे ही रहना है । भागकर कहाँ जायेगे ? बहुत सच्ची बात है *अनासक्ति की बात होती है पर अनासक्ति होना कठिन हैं ।* सब मे रहते हुये भी सबसे अलग होना ही निवृत्ति है । साधको , बस ! राजा दशरथ के मन मे यह बिचार आ गया । राम को राज्य सौंप दूँ । समय आया और राजा दशरथ ने –
*यह विचार उर आनि नृप , सुदिन सुअवसर पाइ ।*
*प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरुहिं सुनायउ जाइ ।।*
राजा गुरुदेव वशिष्ठ के पास पहुँच गये और अपना विचार गुरुदेव के समक्ष प्रकट किया । कहते है , गुरुदेव ! प्रधान , मन्त्री , ब्राम्ह्यण , मित्र और अयोध्या के दुश्मन वर्ग भी राम जी की सराहना करते हैं । यदि आपका आदेश एवं सहमति हो तो मै अब यह राज्य का भार राम के कन्धो पर डाल दूँ । जब यह प्रस्ताव रखा राजा दशरथ ने तब बशिष्ठ जी कहते है , राजन ! बहुत सुन्दर विचार किया है । मै तो इतना कहूँगा कि आप राम के राज्याभिषेक मे बिलम्ब न करो । जितना हो सके जल्दी करो –
*सुदिन सुमंगल तबहिं जब रामु होहिं जुबराज ।*
हे अवधेश !मुहूर्त की आवश्यकता नही हैं ।जिस दिन राम राजा बनेगें उस दिन मंगल ही मंगल है ।
साधको, अगर हम किसी से पूँछे कि हमे भक्ति कब से करनी चाहिये तो संत जन तो यही कहते है कि आज और अभी से प्रारम्भ कर दो ।भक्ति के लिये सभी दिन पवित्र हैं । बशिष्ठ जी ने सामग्री की सूंची दे दी । सब इकठ्ठा कर लो हम जल्द ही राम का राज्याभिषेक करेंगे ।सारा विधि एवं सामग्री बताकर राम के राज्याभिषेक का दिन तय हुआ ।राजा दशरथ अपने महल मे पहुँचे । लोगो को एकत्र किया और प्रजा का मत लिया – *जौं पाँचहि मत लागै नीका* अयोध्या की प्रजा यदि हाँ कहती है तो मै राज्याभिषेक कर दूँ ।
मित्रों प्रथम प्रजा का मत लिया जाता था ।कितनी सुन्दर व्यवस्था थी । लोगो से पहले पूँछा जाता था सहमति थी बहुमत नही था ।यदि एक मत भी विरोध मे होता था अयोध्या मे काम नही होता था । इतनी पुष्ट लोकशाही थी । आज हम जिसे लोकतन्त्र कहते है उसमे बहुमत होता है ।जिसके पक्ष मे बहुमत हो वह शासन करता हैं । जिस समय राम वन गये उस समय सारी अयोध्या राम जी के पक्ष मे थी । सब उनके पक्ष मे थे सिर्फदो को छोडकर कैकेयी और मंथरा ।सिर्फ दो मत विरोध मे होने के कारण राम जी सिंहासन पर नही बैंठे ।
प्रजा ने क्या उत्तर दिया ? आगे की कथा कल …….

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