कांग्रेस और संघ : एक सिंहावलोकन-1 कृष्णानन्द सागर

कांग्रेस और संघ में मौलिक अन्तर

1 कांग्रेस की स्थापना सन 1885 में हुई। संध की स्थापना उसके चालीस वर्ष बाद सन् 1925 में।
2) कांग्रेस के संस्थापक थे श्री एलन आक्टेवियन ह्यूम (ए.ओ.ह्यूम) । संघ संस्थापक डा. केशव बलिराम हेडगेवर।
3) श्री ह्यूम एक अवकाश प्राप्त वरिष्ठ अंग्रेज अधिकारी थे तथा भारत में ब्रिटिश शासन को सुहढ़ता प्रदान करने के लिए ही उन्होने कांग्रेस की स्थापना की। डा. हेडगेवार प्रखर देशभक्त थे। वे पहले क्रान्तिकारी तथा बाद में कांग्रेस के कार्यकर्ता भी रहे और ब्रिटिश शासन को भारत से समुल उखाड़ फेकने के लिए ही उन्होंने संघ की स्थापना की थी।
4 इस प्रकार कांग्रेस और संघ की स्थापना परस्पर-विरोधी उद्देश्यों के लिए की गई थी। श्री हयूम ने अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए चुन-चुन कर अंग्रेज-भक्त भारतीयों को कांग्रेस में शामिल किया। डा. हेडगेवार नें अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिये चुन-चुन कर भारत-भक्तों को संघ परिवार में प्रविष्ट किया।
5 अनेक वर्षों तक कांग्रेस के अधिवेशनों का आरम्भ इंगलैंड के राष्ट्र -गान ‘गाॅड सेव द किंग’ से ही होता रहा। संघ में प्रथम दिन से ही भारत माता की जयगान होता रहा है।
6 अनेक वर्षों तक कांग्रेस का झण्डा भी युनियन बैंक रहा, जो कि इंगलैंड का राष्ट्रीय ध्वज है। लगभग चालीस वर्ष बाद कांग्रेस ने तिरंगे लहराना शुरु किया और छयालीस वर्ष बाद उसने विधिवत-तिरंगे को अपनाया। इसके विपरित, संघ ने आरम्भ से ही हजारों वर्षों से चले आ रहे भारत के परम्परागत राष्ट्र-ध्वज (भगवा-ध्वज) को ही संघ ने लहराना शुरु किया।
7 कांग्रेस में प्रवेश के लिए इंगलैंड के राजा के प्रति निष्ठा की शपथ लेनी पड़ती थी। किन्त संघ में प्रवेश के लिए भारत माता के प्रति भक्ति की शपथ ली जाती थी।
8 कांग्रेस का कार्य अनेक वर्षों तक साल में एक एक अधिवेशन करके कुछ प्रस्ताव पारित कर देने तक सीमिल रहा, बाद में उसने कुछ आन्दोलन चलाए और उसकी प्रवृति आन्दोलनात्मक बन गई। संघ ने जन आन्दोलनों का मार्ग नही अपनाया, उसने अभिनव कार्य पद्धति अर्थात_ ‘दैनिक शाखा पद्धति’ का निर्माण किया, जिसे कांग्रेस आज तक नही समझ पायी। फलत: कांग्रेस में नेता ही नेता निर्माण होते रहे और संघ में कार्यकर्ता ही कार्यकर्ता।
9 जिस ‘वन्दे मातरम’ के उद्घोष ने कांग्रेस को जन-जन तक पहुँचाया, उसी उद्घोष को उसने ‘हिन्दू-मुस्लिम एकता’ की बलिवेदी पर चढ़ा दिया। संघ ‘वन्दे मातरम्’ को केवल उदघोष ही नहीं, तो मातृभूमि के प्रति अनन्य निष्ठा का प्रतिक मानता है।
10 संध ने ‘पूर्ण स्वातन्त्रय’ का लक्ष्य अपनी स्थापना के समय ही घोषित कर दिया था, जबकि कांग्रेस ने संघ-स्थापना के पाँच वर्ष बाद 1930 में इस लक्ष्य को अपनाया।
11) 1947 तक पहुँचते पहुँचते कांग्रेस पूर्ण स्वातन्त्र्य के लक्ष्य को भूल गई और उसने भारत को विबाजन स्वीकार कर लिया। संघ इस लक्ष्य को नही भूला और आज भी अखण्ड भारत की ही उपासना करता है।
12 कांग्रेस ने स्वातन्त्र्य की पहली शर्त ‘हिन्दू-मुस्लिम एकता’ को माना तो संघ नें स्वातन्त्र्य की पहली शर्त ‘हिंदू संगठन’ को माना।
13 कांग्रेस और संघ दोनों ने ही उद्देश्य-प्राप्ति हेतू अहिंसा का मार्ग अपनाया। किन्तु कांग्रेस ने अहिंसा को ‘हिन्दूःमुस्लिम एकता’ की सान पर चढ़ा दिया, फलत: हिन्दुओं में कायरता और मुलसमानों में गुण्डापन बढने लगा। संघ नें अहिंसा को ‘हिंदू संगठन’ की सान पर चढ़ाया, फलत: हिन्दुओं में निर्भीकता व आत्म-विश्वास निर्माण होने लगाऔर वे मुस्लिमों के गुण्डापन को नियंत्रित करने लगे।
14 कांग्रेस और संघो दोनों का लक्ष्य ‘ स्वातन्त्र्य’ होने के बावजूद, ‘स्वातन्त्र्य’ के प्रति दोनों की दृष्टि में अन्तर रहा। कांग्रेस जहाँ राजनीतिक स्वातन्त्र्यता पर ही जोर देती रही, वही संघ राजनीतिक, समाजिक तथ सांस्कृतिक तीनों प्रकार की स्वतन्त्र्ता पर जोर देता रहा। इसी कारण कांग्रेस का विकास एक समझौतावादी राजनीतिक दल के रूप में हुआ और संघ का विकास एक सामाजिक-सांस्कृितक संगठन के रूप में।
15 केवल राजनीतिक दृष्टि ही होने के कारण कांग्रेस अंग्रेजो के फैंके जाल में फँसती गई और मुसलमानों को साथ लेने के चक्कर में मुस्लिम नेताओं से समझौते करती गई। परिणाम हुआ भारत-विभाजन।संघ अंग्रेजो के जाल में नही फँसा। संघ ने संघ-प्रवेश हेतू अहिन्दुओं का न तो आह्वान किया और न ही उन पर प्रतिबंध लगाया। संघ-प्रवेश हेतू संघ नें केवल एक ही कसौटी रखी–मातृभूमि के प्रति अव्यभिचारी निष्ठा। ऐसी निष्ठा जो केवल हिंदू समाज मे है। मुस्लिम या ईसाई समाज में नही। इसलिए मुसलमान व ईसाई स्वयं ही संघ से दूर रहते है।
16 संघ की तरह कांग्रेस भी शुरू से ही हिन्दू संस्था ही है। मुसलमान तो कोई-कोई नमूने के रूप में ही उसमें रहे हैं और वे कांग्रेस में आने व रहने की लगातार कीमत माँगते रहते हैं। व्यवहारिक रूप से हिन्दू संस्था होने के इस सत्य को स्वीकार न कर के कांग्रेस हमेशा अपने को और हिन्दू समजाम को धोखा देती रही है। इसके विपरित संघ ‘हिन्दू संगठन’ है, इस सत्य को संघ सार्वजनिक रूप से हमेशा घोषित करता रहा है।
17 सत्ता प्राप्ति की लालच में कांग्रेस ने 1946-47 में बंगाल सिंध, पंजाब, बलोचिस्तान व सीमा प्रान्त में हिन्दुओं को झुठे आश्वासन दे कर लुटने, पिटने व मरने के लिए पाकिस्तानी भेडियों के आगे बलि के बकरे की भान्ति खुला छोड़ दिया, जिसके परिणाम स्वरूप लगभग 20 लाख हिन्दू मारे गए। संघ ने शेष बचे हुए हिन्दुओं को पाकिस्तानी क्षेत्र से सुरक्षित निकालकर हिन्दुस्थानी क्षेत्र में लाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। इस जोखिम भरे काम में संघ के सैकड़ों स्वयंसेवक बलिदान भी हुए।
18 कांग्रेस की सोच हमेसा साम्प्रदायिक रही है, जो कि मुसलमानों और ईसाईयों के ही इर्द-गिर्द घुमती रही है। अपनी इस साम्प्रदायिकता को उसने नाम दे दिया है—‘धर्म निरपेक्षता’। संघ की सोच हमेशा राष्ट्रीय रही है।, इसलिए उसे ‘धर्म-निरपेक्षता’ के मुखौटे की जरूरत नही।
19 कांग्रेस संघ के प्रति द्वेष-दृष्टि की शिकार है। कोई भी कांग्रेसी यदि कभी संघ-कार्यक्रम में आ जाता है तो उसे कांग्रेस से निष्कासन की धमकियाँ मिलनी शुरु हो जाती हैं। संघ-विरोध कांग्रेस की आदत बन गई है।
20 कांग्रेस की यात्रा विदेशी से विदेशी तक की है–इसका संस्थापक विदेशी, इसकी वर्तमान और अध्यक्ष विदेशी। संघ की यात्रा स्वदेशी से स्वदेशी तक की है–संघ संस्थापक स्वदेशी और अब तक के सभी सर संघचालक स्वदेशी। संघ में कोई विदेशी किसी छोटे से छोटे पद पर भी नही आ सकता है।

लेखक कृष्णानन्द सागर (इतिहासकार व प्रबुद्ध वक्ता चिंतक)

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