शिक्षा की व्यवसायिकरण: लखनऊ में किताब, कॉपी, यूनीफार्म बेचने पर रद्द होगी निजी स्कूलों की मान्यता

समाज जागरण

क्या शिक्षा माफिया पर चलेंगे बाबा के बुल्डोजर, या फिर ऐसे ही होते रहेंगे अभिभावक से लूट, लखनऊ में जनपदीय शिक्षा विभाग के द्वारा उठाये गए कदम सराहनीय, लेकिन अम्ल में लाने से बदलेगा शिक्षा व्यवस्था।

कदम छोटा ही सही लेकिन बढाया जरूर है योगी सरकार ने । अब शिक्षा विभाग नें सीबीएसई, राज्य बोर्ड व अन्य को पत्र लिखकर स्कूल में मनमाने ढंग से कांपी किताब और दूसरे सामाग्री बेचने वाले स्कूल के खिलाफ सख्त कार्यवाही करने का आदेश दिया है। लखनऊ में किताब, कॉपी, यूनीफार्म बेचने पर रद्द होगी निजी स्कूलों की मान्यता, शिक्षा विभाग ने कसी कमर, अभिभावक सीधे कर सकेंगे शिकायत…

नवीन शैक्षिक सत्र में शुल्क एवं पुस्तकों के संबंध में जारी जिला विधालय निरीक्षक लखनऊ के द्वारा 11 अप्रैल 2022 को, पत्रांक: विविवि/ड्रैस-शुल्क/305-09/2022-23, के अनुसार “किसी छात्र को स्कूल के द्वारा विशेष दुकान से पुस्तके, जुते, मोजे व युनिफार्म आदि खरीदने के लिए बाध्य नही किया जायेगा। किसी भी अभिभावक से स्कूल के द्वारा क्रय संबंधित किसी भी दुकान या स्थान का नाम प्रकटीकरण करना आदेश का उल्लंघन माना जायेगा। अगर ऐसा किया जाता है तो आदेश का उल्लंघन माना जायेगा। इस प्रकार के शिकायत मिलने पर विधालय प्रबंधक/प्रधानाचार्य के विरुद्ध विधिक कार्यवाही की जायेगी।

यहाँ बताते चले की यह आदेश सिर्फ उत्तर प्रदेश के राजधानी लखनऊ के लिए जारी किया गया है, बांकि जनपदो से इसका कोई लेना देना नही है। जबकि यह हालत पूरे प्रदेश में है। ऐसे तो भारत में संविधान लागू हुए 75 साल होने वाले है। संविधान का मतलब होता है सभी के लिए एक जैसा विधान। सामान्य व्यवस्था, लेकिन ऐसी व्यवस्था से देश लाखो कोश दूर है।
लेकिन एक तरफ जहाँ सरकारी स्कूल धूल फांक रहे है वही प्राइवेट स्कूलों की चांदी ही चांदी है। शिक्षा माफिया नें इस प्रकार की व्यवस्था बनायी हुई है कि सरकार भी उससे परे नही है। जाहिर है कि सरकार को भी चुनाव लड़ने के लिए चंदा चाहिए और चंदा व्यवसायिक लोग ही देते है। प्रदेश के आर्थिक राजधानी नोएडा में या दूसरे भी शहर में स्कूलों नें अपने हिसाब से पाठयक्रम बनाये हुए है। अभिभावकों के लिए मजबूरी है कि किताब उनको वही से खरीदना पड़ेगा क्योंकि बाजार में वह किताब मिलते नही है। आखिर सरकार एनसीआरटी की किताबे सभी स्कूलों में लागू क्यों नही करती है।

प्राइवेट स्कूल में हर साल में किताबें बदल दिये जाते है ताकि कमाई ज्यादा हो सके। बच्चा या अभिभावक अपने से नीचे क्लास वालों को अपना किताब नही दे पाए। उनके कांपी तक स्पेशल होते है वह भी काफि महंगी दाम की। कांपी और किताब के लिए स्पेशल कवर भी मंगवाए जाते है वही भी विशेष कलर के विशेष दुकान से। जुते, मौजे, पेंसिंल रबर और कटर सबकुछ स्पेशल चाहिए। पांचवी क्लास की बच्चे की किताबे 4-4 हजार की है। दिल्ली एनसीआर के 85% स्कूल में बच्चों को खेलने के लिए मैदान तक नही है। जिस स्कूल में है भी तो वह किराये पर लगाकर पैसे कमा रहे है वह भी डबल।

अच्छा होता की बाबा के बुल्डोजर इन शिक्षा माफिया पर भी एक बार चलता। अभिभावक को चाहिए कि योगी सरकार से स्कूल और शिक्षा की मांग करे और सरकार को सहयोग भी। अगर आप अपने बच्चे को प्राइवेट में 3 हजार महीना फिस देते है उसका 30 प्रतिशत अगर आप सरकारी स्कूलों में दान करे निश्चित तौर पर स्कूल और शिक्षा की व्यवस्था प्राइवेट स्कूल से बेहतर किया जा सकता है। क्योंकि सरकार के पास जगह की कमी नही है। अभिभावक को फैसिलिटी से ज्यादा ध्यान शिक्षा पर देनी चाहिए। फैसिलिटी के नाम पर सबसे बड़ी लूट है।

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