नहीं चाहा कि मशहूर हो जांऊ मैं।
बस अपने आप को मंजूर हो जांऊ मैं।”

#*चुनावी चखचख के बीच हरेश उपाध्याय की दिल्ली-दृष्टि #*
“नहीं चाहा कि मशहूर हो जांऊ मैं।
बस अपने आप को मंजूर हो जांऊ मैं।”
सुधि पाठकों !आज की चुनावी चखचख में, आपका खैर-मकदम/इस्तकबाल है।इसकी इब्तिदा, अजीज़ शायर जनाब राजेश रेड्डी के कलाम से करते है।”नहीं चाहा कि मशहूर हो जांऊ मैं। बस अपने आप को मंजूर हो जांऊ मैं।सच न बोले तो यह कैसा आईना? न बोलूं सच तो चकनाचूर हो जांऊ मैं। नहीं रहबर तो भी मजबूर हो जांऊ मैं।”प्रियंका वाड्रा गांधी कांग्रेस के थोपित व सुसेवकों द्वारा पोषित युवराज राहुल गांधी के सियासी फेल्योर के बाद,एक नई उम्मीद-आश के साथ, खासतौर से उत्तर प्रदेश की सियासी जंग में उतरी और मेहनत भी की, मगर नतीजा सिफर सा ही लग रहा है, उत्तर प्रदेश के चुनावी संग्राम में।कल,जब प्रेस कांफ्रेंस के दरम्यान,एक पत्रकार ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के लिए सवाल दागा तो उन्होंने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया कि कांग्रेस पार्टी में, उनसे इतर कोई और चेहरा है?हम भी उसी जमात से ठहरें और उनके चेहरे वाले जवाब को लपक लिया। गौरतलब है कि प्रियंका वाड्रा गांधी मशहूर तो पहले से ही है और अब और मशहूर हो जाएं या फिर अपने आप से मंजूर हो जाए। चुनावी सूबों की जनता बखूबी जानती है और वह तो आईने के मानिंद होती है। यदि वह आपको अंगीकार नहीं करती तो—चूर कर देगी। सुधि पाठकों!यह भी स्पष्ट कर दें कि अब आवाम चेहरे की चमक और मुस्कान पर नहीं मरती है,यह बीते दिनों की बात है।अब तो अवाम को, आपको डिलीवर करना ही होगा। कमोवेश कांग्रेस की स्थिति तो आज कुछ ऐसी ही है कि उसे कोई सियासी रहबर भी मयस्सर नहीं हो पा रहा है।कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रियंका वाड्रा गांधी,बेचारी मजबूर हो और मजबूर होकर ही सोच रही हो कि अपने आप ही मंजूर हो जांऊ मैं।
चुनावी चखचख के बीच पढ़ते रहियेगा।अगले अंक में,ना जाने किस सियासी- सख्सियत की बारी आ जाएं?

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