बिल्डर-बायर समस्या: मौलिक भारत के प्रतिवेदन पर महामहिम राष्ट्रपति नें लिया संज्ञान

धर खरीदारों के लिए बड़ी खुशखबरी, बिल्डर-बायर समस्या को लेकर मौलिक भारत के प्रतिवेदन पर महामहिम राष्ट्रपति ने लगाया मुहर। मौलिक भारत के प्रतिवेदन को कार्यवाही हेतू उत्तर प्रदेश सरकार को भेजा । प्रतिवेदन पर कार्यवाही करते हुए प्रदेश सरकार को सीधे याचिकाकर्ता को अवगत कराने के लिए भी कहा गया है। पत्र उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव को भेजा गया है। भ्रष्टाचार के दलदल में फंसे जिला गौतमबुद्धनगर पर माननीय न्यायालय के बाद अब राष्ट्रपति की हरी झंडी मिलना निश्चित ही घर खरीदारों के लिए बड़ी खबर है बशर्ते इस पर उत्तर प्रदेश सरकार अगर संज्ञान ले। संभवत: प्रदेश सरकार के पास भी कार्यवाही करने के लिए सीएजी आडिट रिपोर्ट तक मौजूद है। पत्र में रेरा को ज्यादा शक्ति देने की बात निश्चित तौर पर घर खरीदारों के लिए राहत की सांस लेने जैसी है। क्योंकि वर्तमान में रेरा आरसी तो काट सकती है लेकिन वसूली करने की पावर नही है। बिना दांत वाले शेर भी लोग कहने लगे है। हाल ही में आर सी पर कारवाई नही करने को लेकर जिला गौतमबुद्धनगर के जिलाधिकारी को माननीय प्रयागराज कोर्ट में तलब किया गया।

मौलिक भारत नें जिला गौतमबुद्धनगर के तीनों प्राधिकरण में लाखों घर खरीदार के समस्या को लेकर मौलिक जन-संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया और मंथन के उपरान्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को सुझाव भेजा। लेकिन वर्तमान समय में उस पर कोई प्रभावी कदम नही उठाए गए है। भारत के राष्ट्रपति के द्वारा इस मामले पर संज्ञान लेने से उम्मीद है कि जल्द से जल्द घर खरीदारों की समस्या का हल निकाला जायेगा। हालांकि इससे पहले भारत के सर्वोच्य न्यायलय नें भी नोएडा प्राधिकरण के बारे में सख्त टिप्पणि करते हुए कहा था कि नोएडा तो पूरी तरह से भ्रष्टाचार में डुबा हुआ है। इसके तो आंख, कान व नाक से नही बल्कि चेहरे से भ्रष्टाचार टपकता है।

यह बात माननीय न्यायालय नें नोएडा सेक्टर 93 स्थित ट्वीन टावर केस में सुनवाई के दौरान कहा। जन संवाद में मौलिक भारत के अध्यक्ष अनुज अग्रवाल ने कहा कि जिला गौतमबुद्धनगर के तीनों प्राधिकरण में 20 लाख करोड़ से ज्यादा की घोटाला है। महाराज अग्रसेन भवन में आयोजित जन संवाद में मौलिक भारत के प्रतिनिधी के अलावा बहुत से बायर एवं रेजिडेंसियल एसोसिएशन के प्रतिनिधी नें भी भाग लिया और सुझाव दिए। 26 सितंबर को आयोजित इस मंथन में जो विष निकला था उसका वह इस प्रकार से है:-

मौलिक जन संवाद* के मंथन के उपरांत मौलिक भारत ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को भेजे सुझाव : बिल्डर प्राजेक्ट्स के लिए एक राज्य नीति बनायी जानी चाहिए रेरा के पास पर्याप्त न्यायिक शक्तियाँ हों व प्राधिकरणों, शीर्ष राजनेताओ, नौकरशाही, बिल्डर, ठेकेदार, बिचोलिया फर्मों आदि की जवाबदेही स्पष्ट रूप से निर्धारित हो

मौलिक भारत नेताओं-सरकारी बाबुओं- बिल्डरों के गठजोड़ के खिलाफ व आम निवेशकों के हित में लगातार आवाज उठा रहा है। जिला गौत्तमबुद्ध नगर देश में इस भ्रष्ट व्यवस्था का सबसे बड़ा शिकार रहा है। मौलिक भारत की पहल पर नेताओं-सरकारी बाबुओं- बिल्डरों के गठजोड़ के खिलाफ व आम निवेशकों के हित में समस्याओं के समाधान के लिए कुछ रचनात्मक व सकारात्मक उपाय ढूंढने के लिए दिल्ली एनसीआर की प्रमुख संस्थाओं (गौतमबुद्ध नगर सहित दिल्ली एनसीआर के स्ट्रेस प्रोजेक्ट ( लटके हुए बिल्डर प्रोजेक्ट) से जुड़े निवेशकों के संगठनों जो बायर्स के हितों के लिए प्रभावी कार्य कर रहीं हैं ) व अन्य प्रमुख सामाजिक संस्थाओ के अनुभव व सुझावों को साझा करने व सम्मिलित कार्ययोजना बनाने के लिए 26/9/2021 , रविवार को अग्रसेन भवन, नोएडा में दोपहर 2 बजे से सायं 6 बजे के बीच *मौलिक जन संवाद*का आयोजन किया था। इस जनसंवाद व उसके बाद के मंथन के उपरांत गौतमबुद्ध नगर सहित दिल्ली एनसीआर के स्ट्रेस प्रोजेक्ट ( लटके हुए बिल्डर प्रोजेक्ट) की समस्या को सुलझाने के लिए मौलिक भारत ने निम्न सुझाव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी को भेजे हैं। सुझावों की प्रति माननीय प्रधानमंत्री जी , मुख्य न्यायाधीश उच्चतम न्यायालय व शहरी विकास मंत्री भारत सरकार को भी भेजी गई हैं। अनुज अग्रवाल, राष्ट्रीय अध्यक्ष, मौलिक भारत , पंकज सरावगी, राष्ट्रीय कानूनी सलाहकार, मौलिक भारत व अनिल गर्ग, राष्ट्रीय सचिव, मौलिक भारत ने विस्तार से बताते हुए स्पष्ट किया की मौलिक भारत ने मांग की है कि नोएडा , ग्रेटर नोएडा व यीडा प्राधिकरणों के लिए आवश्यक है कि:

a) प्राधिकरणफंसे हुए प्राजेक्ट्स की निम्न प्रकार की सूची बनायें –

1) वे प्रोजेक्ट जो समाधान के लिए CIRP (IBC (b) के अंतर्गत आ गए हैं।

2) जिन प्रोजेक्ट की भूमि बिल्डर ने PSP के अंतर्गत वापस कर दी है और अभी तक फ्लैट देने में असमर्थ है।

3) जिन बिल्डरों ने प्राधिकरणों को देय किश्त का पिछले दो वर्षों से भुगतान नहीं किया है ।

4) जिस प्रोजेक्ट की RERA (Real Estate Regulatory Authority)के पास बहुत अधिक शिकायतें हैं।

5) वे प्रोजेक्ट जिनको प्राधिकरणों ने तीन सौ करोड़ रुपए से अधिक के ऋण के बदले प्रोजेक्ट को गिरवी रखने की अनुमति दो हुई है।

b) प्राधिकरणप्रोजेक्टकी जमीन आवंटन रद्द करने के स्थान पर “ बेस रेज़लूशन प्लान” लेकर आए, जिससे यह स्पष्ट हो सके की फँसे हुए प्रोजेक्ट को शुरू किया जा सकता है या नहीं और उसमें फंसे/ डूबे हुए धन की वापसी संभव है या नहीं।इस लचीले रवैए व प्रक्रिया से अनेक बिल्डर समाधान के लिए सामने आ सकते हैं और प्राधिकरण को फँसा हुआ धन व निवेशक को फ्लैट मिलना संभव हो सकेगा।
c) प्राधिकरणोंकीहाथ झाड़ने की जगह हमेशा के लिए “ ऐसेट्स रीकंस्ट्रक्शन ओरगेनाइज़ेशन” के रूप में सक्रिय भूमिका अपेक्षित है क्योंकि वे इसीलिए बिल्डर को उदार शर्तों पर भूमि उपलब्ध कराती हैं ताकि निवेशक को सस्ता मकान मिल सके। निवेशक भी इसी भरोसे से इन प्राजेक्ट्स में निवेश करता है क्योंकि उसको यह भरोसा होता है कि इन प्राजेक्ट्स के पीछे प्राधिकरण के रूप में सरकार मौजूद है। यह प्राधिकरण व सरकारों की जिम्मेदारी व जवाबदेही भी है कि यह भरोसा न टूटे।
d) यहप्राधिकरणोंकी ज़िम्मेदारी है कि वे ऐसा मेकेनिज़्म विकसित करें कि मौजूदा विवादों का समाधान हो व आगे किसी भी प्रोजेक्ट में यह स्थिति आने पर निवेशक का कोई भी नुकसान हुए बिना , उसके तुरंत समाधान का मार्ग प्रशस्त रहे।
e) प्राधिकरणएक“स्ट्रेस रेज़लूशन फंड” का गठन करें जो अटके हुए प्राजेक्ट्स को जिनको कु-प्रबंधन के कारण अस्थायी रूप से फंड की कमी है, को तुरंत अंतरिम/ब्रिज फ़ंडिंग उपलब्ध करवा सके।
f) प्राधिकरणोंकोअपनी लीगल टीम मैं ऐसे पेशेवर विशेषज्ञ रखने होंगे जो अटके हुए मामलों को निपटाने में पारंगत हों।
प्राधिकरणों को सभी अटके हुए प्राजेक्ट्स के मामलों में संबंधित बिल्डरों के विरुद्ध सीआईआरपी में भाग लेते हुए एक स्थायी नीति बनानी होगी।

g) जिनप्राजेक्ट्सका आवंटन प्राधिकरणों ने रद्द किया है उनके फिर से शुरू होने की स्थिति बनने पर पुनराबँटन शुल्क माफ होना चाहिए।
h) अटकेहुएबिल्डर की कंपनी में जो सीआईपीआर के समाधान से गुज़र रही है की शेयरहोल्डिंग बदलने पर सभी प्रकार का ट्रांसफर चार्ज व संविधान में परिवर्तन का शुल्क माफ होना चाहिए। इससे अटके हुए प्रोजेक्ट को पुनः शुरू करना आसान होगा।
i)जिन प्राजेक्ट्स में निर्धारित मात्रा में ग्राउंड कवरेज नहीं हुई थी , समाधान प्रक्रिया में बचे हुए एफएआर (वाणिज्यिक) को रियायती दरों पर उपयोग करने की अनुमति दी जाए ताकि वह प्रोजेक्ट फिर से व्यावहारिक बन सके।
j) उनमामलों में जिनमे आबँटी किसी अन्य कंपनी के साथ JDA कर चुका है और आबँटी दिवालिया हो गया हो या डेवलपर दिवालिया हो गया हो , ऐसे मामले व्यावहारिकता पूर्ण तरीके से हल किए जाने चाहिए
1) जो जेडीए हो उसकी मान्यता व देय सब लीज पर लगने वाली स्टांप डयूटी स्थगित रखी जाए।

2) भूमि के उस विशेष हिस्से की भूमि बकाया राशि की गणना जेडीए द्वारा भूमि बकाया के लिए किए गए वास्तविक भुगतान को ध्यान में रखते हुए की जानी चाहिए।

k) जिनपरियोजनाओंमें आरडब्ल्यूए या फ्लैट ओनर्स एसोसिएशन ने अपने नियंत्रण में ले लिया है और व्यवसाय प्रमाण पत्र के लंबित हो फ्लैटों का पंजीकरण अभी भी नहीं है परियोजनाओं को दी जाने वाली कंपाउंडिंग फीस की माफी दी जानी चाहि
l) स्ट्रेसप्रोजेक्ट्सकी वित्तीय व्यवहार्यता के लिए मार्ग प्रशस्त करने के लिए प्राधिकरणों को 8% ब्याज लगाने के माननीय सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बेहिचक बिना किसी पूर्वाग्रह के अटके प्रोजेक्ट की वित्तीय व्यवहार्यता के लिए स्वीकार करना चाहि
m) CIRP केअंतर्गतआने वाली सभी दबावग्रस्त परियोजनाओं पर “देर से निर्माण दंड” की छूट होनी चाहिए।
n) ऐसेमामलेजहां प्राधिकरणों ने लीज डीड को रद्द कर दिया है, उसे ऐसा तंत्र बनाना होगा जो .पीड़ित घर खरीदारों को बढ़े हुए भूमि मूल्य मुआवजा दें यह धन प्राधिकरणों को नए आवंटन से वसूलना होगा।
o) दबावग्रस्तपरियोजनाओंके फ्लैटों/दुकानों की बिक्री पर स्थानांतरण शुल्क में छूट मिलनी चाहिए। यहां तक कि ऐसे फ्लैटों और दुकानों के पूर्व- रजिस्ट्री हस्तांतरण की एक निर्धारित अवधि के लिए अनुमति दी जाए।
p) प्राधिकरणों, वित्तीयसंस्थानोंऔर यूपी-आरईआरए के बीच घनिष्ठ कार्य संबंध होने बहुत आवश्यक हैं।
इसलिए प्राधिकरणों की यह जिम्मेदारी है कि वह न केवल तनावग्रस्त परियोजनाओं की समस्या का वास्तविक समाधान प्रस्तुत करें बल्कि एक स्थायी तंत्र बनाने के लिए भी आगे आयें जिसमें परियोजनाएं जो भविष्य में तनावग्रस्त हो जाते हैं, उनमें हितधारकों के किसी नुकसान के तुरंत समस्या का समाधान हो सके। संस्था ने मुख्यमंत्री जी से आग्रह किया है कि उसके सुझावों के अनुरूप बिल्डर प्राजेक्ट्स के लिए एक राज्य नीति बनायी जानी चाहिए ताकि समयबद्ध रूप से अटके हुए प्रोजेक्ट की समस्या का निवारण हो व भविष्य में इस प्रकार की समस्या फिर से न उत्पन्न हो। सुप्रीम कोर्ट के सुझावों के अनुरूप बिल्डर- बायर अग्रीमेंट में एकरूपता हो। जिसमें रेरा के पास पर्याप्त न्यायिक शक्तियाँ हों व प्राधिकरणों, शीर्ष रजनेताओ, नौकरशाही, बिल्डर, ठेकेदार, बिचोलिया फर्मों आदि की जवाबदेही स्पष्ट रूप से निर्धारित हो। साथ ही यह भी अनुरोध किया गया है कि राज्य सरकार केंद्र सरकार से भी इसी प्रकार का केंद्रीय कानून बनाने की सिफारिश भी करे।

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