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दिमाग की हवा-EGO

दिमाग की हवा-EGO

एक कार कंपनी में ऑटोमोबाइल इंजिनियर ने एक वर्ल्ड क्लास कार डिज़ाइन की। कंपनी के मालिक ने कार की डिजाईन बेहद पसंद की और इंजिनियर की खूब तारीफ की।

जब पहली कार की टेस्टिंग होनी थी तो कार को फैक्ट्री से निकालते समय उसे अहसास हुआ कि कार शटर से बाहर निकल ही नहीं सकती थी, क्योंकि कार की ऊंचाई गेट से कुछ इंच ज़्यादा थी। इंजिनियर को निराशा हुई कि उसने इस बात का ख्याल क्यों नहीं किया।

इसके दो उपाय सूझे:
पहला, कार को बाहर निकालते समय गेट की छतसे टकराने के कारण जो कुछ बम्प, स्क्रैच आदि आएं, उन्हें बाहर निकलने के बाद रिपेयर किया जाये। पेंटिंग सेक्शन इंजिनियर ने भी सहमति दे दी, हालाँकि उसे शक था कि कार की खूबसूरती वैसी ही बरक़रार रहेगी।

कंपनी के जनरल मैनेजर ने सलाह दी कि गेट का शटर हटाकर गेट के ऊपरी हिस्से को तोड़ दिया जाय। कार निकलने के पश्चात गेट को रिपेयर करा लेंगे।

यह बात कंपनी का गार्ड दिनेश सुन रहा था। उसने झिझकते हुए कहा कि अगर आप मुंझे मौका दें तो शायद मैं कुछ हल निकाल सकूँ। मालिक ने बेमन से दिनेश को स्वीकृति दी।

दिनेश ने चारों पहियों की हवा निकाल दी, जिससे कार की ऊंचाई 3-4 इंच कम हो गयी और कार बड़े आराम से बाहर निकल गयी।

किसी भी समस्या को हमेशा एक्सपर्ट की तरह ही न देखें। एक आम आदमी की तरह भी समस्या का बढ़िया हल निकल सकता है।

“कभी कभी किसी दोस्त के घर का दरवाजा हमें छोटा लगने लगता है, क्योंकि हम अपने आपको ऊँचा समझते हैं। अगर हम अपने दिमाग से थोड़ी सी हवा (ईगो) निकाल देवें, तो आसानी से हम अंदर जा सकते हैं। ज़िन्दगी सरलता का ही दूसरा नाम है।”

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