बिहार सरकार देगी कैथी लिपि को बढ़ावा, 7 भाषाओं से रहा है जुड़ाव, शेरशाह ने कैथी में बनवाये थे मुहर*

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*रीता कुमारी, ब्यूरो चीफ, दैनिक समाज जागरण*

*पटना।* बिहार के संस्कृति एवं युवा विभाग के अपर सचिव दीपक आनन्द ने कहा है कि ऐतिहासिक कैथी लिपि को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार ने कई कदम उठाने का फैसला लिया है। सरकार ने इस लिपि को न केवल संरक्षित करने का फैसला किया है बल्कि कैथी विशेषज्ञों के साथ विस्तृत चर्चा के बाद जल्द ही इस लिपि के पुनरुद्धार के लिए एक योजना भी तैयार की जायेगी।
दीपक आनन्द के मुताबिक भारतीय भाषाओं अंगिका, बज्जिका, अवधी, भोजपुरी, मगही, मैथिली और नागपुरी के लिए कैथी लिपि का उपयोग कानूनी, प्रशासनिक और निजी रिकॉर्ड लिखने के लिए किया जाता था। कैथी लिपि का जुड़ाव 7 से अधिक भाषाओं से रहा है। बिहार समेत उत्तरी और पूर्व भारत में इस लिपि का व्यापक उपयोग किया जाता था।
1960 के दशक तक बिहार के कुछ जिलों में इसका उपयोग होता रहा, लेकिन धीरे-धीरे यह व्यवहार से बाहर होता चला गया। एक समय सम्राट शेरशाह सूरी ने देवनागरी और फारसी के अलावा कैथी लिपि में भी मुहर बनवाये थे।

*बिहार की आधिकारिक लिपि थी कैथी*

विशेषज्ञों के अनुसार, मुगल शासन के दौरान कैथी का बिहार, उत्तरप्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता था। ब्रिटिश राज ने 1880 के दशक में इसे बिहार की अदालतों की आधिकारिक लिपि के रूप में मान्यता दी थी। इस क्षेत्र में व्यापक रूप से इस्तेमाल की जानेवाली तीन लिपियों में कैथी को तटस्थ माना जाता था, क्योंकि इसका इस्तेमाल सभी समुदायों द्वारा किया जाता था।
पटना स्थित एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज के प्रोफेसर विद्यार्थी विकास ने कैथी को बढ़ावा देने के सरकार के कदम की सराहना की। उन्होंने कहा, पहले सरकारी कार्यालयों और अदालतों के रिकॉर्ड ज्यादातर कैथी लिपि में लिखे जाते थे लेकिन अब शायद ही ऐसे लोग मिलते हैं जो उन्हें समझ सकेंगे।

*जनलिपि थी कैथी, साहित्य लिखे जाते थे*

कैथी लिपि के जानकार भैरवलाल दास के मुताबिक, गुप्त काल के शासकीय अभिलेख कैथी लिपि में लिखे जाने का प्रमाण मिला है। पटना म्यूजियम में भी कैथी लिपि में स्टोन स्क्रिप्ट संरक्षित है। चम्पारण आन्दोलन के लिए महात्मा गांधी को बिहार लानेवाले महापुरुष की डायरी भी कैथी लिपि में लिखी थी, जिसका उन्होंने अनुवाद किया है।
उनका कहना है कि कैथी जनलिपि रही है। लिखने में आसान होने के कारण यह जनलिपि थी। बिहार में अंगिका, मगही, मैथिली, बज्जिका और भोजपुरी भाषाओं के भी साहित्य को कैथी में लिपिबद्ध किया गया है। बिहार से लेकर उत्तरप्रदेश तक में आमजनों, महिलाओं और कम शिक्षित वर्ग भी कैथी में ही अपनी बातें लिखते थें। जब देवनागरी प्रचलित नहीं थी, तब कैथी में ही साहित्य लिखे जाते थे। असंख्य कविताएं, कहानियां, नाटक और उपन्यास कैथी में लिखे गये हैं।

*जमीन के दस्तावेजों में प्रयोग*

जमीन के जो पुराने दस्तावेज देवनागरी नहीं, कैथी लिपि में लिखे जाते थे। 50-60 साल पहले भी जमीन के दस्तावेज इसी लिपि में लिखे जाते थे। थानों में एफआइआर भी कैथी लिपि में लिखे जाने के प्रमाण मिले हैं। चूंकि सैकड़ों साल से महाजन इस लिपि में बही खाता लिखते थे, इसलिए इसे महाजनी लिपि भी कहा गया।

*सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण*

दीपक आनन्द ने कहा कि कैथी का इस्तेमाल बिहार के कुछ जिलों में 1960 के दशक तक किया जाता था। सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, रखरखाव और संवर्धन में भाषाओं और लिपि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
पिछले सप्ताह लखनऊ में आयोजित उत्तर-मध्यक्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र की शासी निकाय की बैठक में इसपर चर्चा की गयी थी। बैठक की अध्यक्षता उत्तरप्रदेश की राज्यपाल आनन्दी बेन पटेल ने की थी और इसमें उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड और दिल्ली के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था।
दीपक आनन्द के मुताबिक उन्होंने एनसीजेडसीसी के निदेशक सुरेश शर्मा के साथ इस मुद्दे पर अलग से चर्चा की। आनन्द ने कहा कि बिहार सरकार कैथी लिपि के पुनरुद्धार की योजना पर काम करेगी और जल्द ही इसे लेकर आयेगी। इसके अलावा लोक और आदिवासी कलाओं को प्रोत्साहित करने और कैथी लिपि सहित लुप्त हो रही कलाओं के अन्य रूपों और भाषाओं के संरक्षण के लिए विशेष कार्यक्रम तैयार करने के प्रयासों पर विस्तार से चर्चा की गयी।

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