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स्नान का महत्व

स्नान
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जाड़े के दिनों में स्नान नहीं करने सम्बंधी पोस्ट्स की बाढ़ को देखकर हर बार मैं चकित रह जाता हूं!

इस आश्चर्य के दो रूप हैं। एक तो यह, कि छी: इतने सारे लोग जाड़ों में नित्य नहान नहीं करते! और दूसरा यह, कि वो इसे सबको ऐसे अडोल चित्त से बतलाते भी हैं!

मैं तो समझता था कि मनुष्य की वृत्ति यह है कि वह अपनी बुराइयों को भरसक छुपाता है। कोई जान न ले कि मुझमें यह दुर्गुण है, यही उसका स्वभाव है। या शायद समय के साथ अब यह बदल गया हो। क्योंकि, बंधुवर, नित्य स्नान नहीं करना तो भली बात नहीं।

आपको पता है, शयन के उपरान्त देह की शौचमुक्ति अनिवार्य है? इसका कोई विकल्प नहीं। नित्य भोजन की तरह यह नित्य का कर्म है। सुविधा-असुविधा का चिंतन त्यागकर इसे करना होता है। स्नान की युति ध्यान से यों ही नहीं बनाई है। स्नान किसी ध्यान, मनन, चिंतन, भजन से कम पवित्र नहीं। नहान के बिना सोमती और शनिश्चरी नहीं होती। नहान के बिना कुम्भ नहीं होता। अर्घ्य नहीं होता। नहान के बिना तुलसी नहीं पुजाती। यह कोई साधारण वस्तु थोड़े ना है!

यह भला क्या तर्क हुआ कि इतनी सर्दी है कि जल से शीत लगता है। इतनी सर्दी में वायु से भी शीत लगता है किंतु श्वास-प्रश्वास का त्याग भला कौन करता है? मेरे लिए तो नित्य स्नान निरंतर श्वास-प्रश्वास से कम सम्यक नहीं।

मैं तो स्नान के बिना अन्न ग्रहण नहीं करता, और जाड़े की क्या बात है, ज्वर हो तब भी नियमित स्नान करता हूं। स्नान के बिना भोजन का ग्रास कंठ से नीचे उतारना तो निषिद्ध है! यह किसी शास्त्र की लिखी बात नहीं बतला रहा कि यह निषिद्ध और वह स्वीकार्य। यह तो देह स्वयं ही बतला देती है, पृथक से इसे जानने की आवश्यकता नहीं। अन्न ब्रह्म है। उसकी प्राप्ति के लिए देह को उसके योग्य होना पड़ता है। पवित्र होना पड़ता है। शुद्धि और क्षुधा के बिना तो भोजन ग्रहण पाप से कम नहीं।

अंग्रेज़ी कालबोध में नया दिन रात बारह बजे से शुरू हो जाता है। तिथि उलट जाती है। कुछ के लिए यह ब्रह्म मुहूर्त से आरम्भ होता है। कुछ के लिए भोर के बाद। मैं तो कहूंगा, दिन स्नान के बाद ही आरम्भ होगा। जब तक स्नान नहीं हुआ, तब तक यह विगत का ही दिन है। उसी की उत्तर-गति है। दिवस का अवसान हुआ, रात्रि घिर आई, शयन हो रहा, नींद खुल गई, किंतु यह अभी नया दिन नहीं है। यह पुराने दिन की ही शेषकथा है। नया दिवस तो नहान के बाद ही होगा। नया जीवन भी। नया संवत् भी। वह सब जो नया है, नहान का उपरान्त है! नहान नावीन्य का उपसर्ग है।

फिर स्नान एक निजी रागात्मक अनुभूति भी तो है। उसके ऐंद्रिक ब्योरों में भला क्यूं जाऊं, यह उसका अवसर नहीं। किंतु ईश्वर ने मनुष्य की देह को ऐसे ही रचा है कि जल के स्पर्श से वह रोमांचित होती है। यह रोमांच शब्द रोमावली से बना है। रोमावलियां त्वचा का सूचकांक हैं। त्वचा के सत्व का परिविस्तार। त्वचा की सूक्ष्मतर अनुभूतियों की अभिव्यंजना रोमकूपों पर होती है।

यह तो स्वीकारूं कि मैं ऐसा हठयोगी भी नहीं कि जाड़ों में शीतल जल से स्नान करूं, किंतु जल में यदि ऊष्मा हो तो क्या हानि है? वास्तव में जाड़े के अनेक सुखों में एक यह है कि ऊष्मावान जल से नहान हो, और धूप की तपिश त्वचा पर संतुष्टि का अंगराग रचे। जाड़े की ऋतु को त्वचा की सूक्ष्मश्रवा अनुभूतियों के संस्पर्श के लिए ही सृष्टा ने सिरजा है।

पुराने वक़्तों में रूपसियां देह पर उबटन और अंगराग मलती थीं। वह स्नान के उपरान्त नित्यप्रति का उद्यम रहता था। मांडवगढ़ में एक कपूर सागर है। कपूर सागर ऐसे कि नवाब बहादुर के हरम की हसीनाएं जब इस तालाब में नहान करती थीं तो यह पूरा ताल महकने लगता था। वे देह पर इतना अंगराग मलती थीं कि उनके ग़ुसल के बाद देर तलक ये तलैया कपूर की गंध में ऊभचूभ होती रहती। यह क़िस्सा सुनते ही मुझे राजशेखर की कर्पूरमंजरी याद आई थी। रनकपुर के मंदिरों में शालभंजिका के शिल्प को स्नाताकर्पूरमंजरी की तरह ही तो चित्रित किया गया है। एक सद्यस्नाता रूपसी, जिसकी देह में कर्पूर की गंध!

सद्यस्नाता : इस शब्द का स्मरण रखें। यह भारतीय परम्परा से अविच्छिन्न है। स्नान नहीं तो सौंदर्य नहीं। नहान सुंदरता का आयाम है। तिस पर भी, वैसी सुंदरता, जो सद्यस्नात हो। अभी-अभी नहाई। देह और केश में शीत और गंध और नमी। प्रणय में आलोकन और उद्दीपन। धूप को न्योता कि आओ, मेरी त्वचा पर कोई रेखाचित्र रचो। कि अब जाकर- मैं सद्यस्नात- तुम्हारे योग्य हूं!

मैं आज के समय की उन सभी रूपसियों को नमन करता हूं, जो शीतकाल में भी नित्यप्रति नहान करती हैं। नहान में नागा की रीत नहीं। वह बिलानागा ही हो। न हो अंगराग और उबटन, पीयर्स साबुन की महक ही सही। केश में शिकाकाई नहीं, किसी बांके नाम वाले शैम्पू की गंध ही सही। किंतु स्नान ही देह का पहला अलंकार है। बाज़ूबंद तो बाद में बंधेगा। मांगटीका बाद में सजेगा। चूड़ियां बाद में बजेंगी।

उपवासी भी नहान करता है। भोजन की छुट्‌टी सम्भव है, स्नान की नहीं। एक अंतिम स्नान फिर हम सभी पर शेष है। मृत्यु में प्रवेश के बाद भी देह की शुद्धि के नियम हैं। यह कोई साधारण कर्म तो नहीं। शीत है तो क्या, स्नान तो नित्य ही करना चाहिए। और अगर नहीं कर सकते हो तो कम से कम सभी को यों मुदित होकर बतलाओ तो नहीं। इतना संयम तो रखो।

अपने अभावों को भला कौन संसार को यों चाव से बतलाता है? 😊

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