शीर्ष न्यायालय की भाषा

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                          शीर्ष न्यायालय की भाषा 

         न्याय भारतीय दर्शन की मौलिक अवधारणा है और इसकी प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि यह सहज और सरल रूप में अर्थात स्वभाषा में हों ।  संविधान लागू होने के 72 साल बाद भी केवल चार राज्यों राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार के उच्च न्यायालय में किसी भारतीय भाषा (हिंदी) के प्रयोग की अनुमति है । सन 2002 में छत्तीसगढ़ सरकार ने हिंदी और 2010, 2012 में तमिलनाडू और गुजरात की सरकारों ने अपने –अपने  उच्च न्यायालय में तमिल और गुजराती के प्रयोग का अधिकार देने कि मांग की है । पर इन तीनों मामलों की मंजूरी नहीं मिली । वर्ष 2014 में कर्नाटक सरकार ने कन्नड़ को कर्नाटक उच्च न्यायालय तथा तमिलनाडू सरकार ने पुन: तमिल को तमिलनाडू उच्च न्यायालय में प्रयोग का अधिकार देने की मांग केंद्र सरकार से की है । केंद्र सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट को विचारार्थ भेजा है, जिस पर फैसला अभी लंबित है । 

    सुप्रीम कोर्ट की किसी भी कार्रवाई में हिंदी का प्रयोग पूर्णत: प्रतिबंधित है ।  संविधान के अनुच्छेद 348 के खंड 1 के उपखंड (क) में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट और हर उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाहियाँ अंग्रेजी भाषा में होगी । हालांकि इस अनुच्छेद के खंड 2 के तहत किसी राज्य का राज्यपाल यदि चाहे तो राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उच्च न्यायालय में हिंदी या उस राज्य की राजभाषा के प्रयोग की अनुमति दे सकता है पर ऐसी अनुमति उस उच्च न्यायालय द्वारा दिये गए किसी निर्णय, डिक्री या आदेश पर लागू नहीं होती । यानि उच्च न्यायालय में भी भारतीय भाषाओं के सीमित प्रयोग की ही व्यवस्था है । 

    2005 में संसदीय समिति ने सुप्रीम कोर्ट सहित सभी अदालतों में हिंदी भाषा में काम करने संबंधी प्रस्ताव दिया था, जिसे केंद्र सरकार ने विचारार्थ विधि आयोग भेजा था । तत्कालीन विधि आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति ए. आर. लक्ष्मणन  ने अपनी रिपोर्ट (216 वीं)  में सरकार से  अन्य बातों के साथ-साथ सुझाव दिया था कि यदि वह इन शीर्ष अदालतों में भी हिंदी को लागू करना चाहती है तो सरकार अनुच्छेद 348 में संशोधन करवाकर ऐच्छिक भाषा के रूप में इसे लागू करवा सकती है लेकिन अदालतों से अंग्रेजी को व्यावहारिक कारणों से  समाप्त नहीं कर सकती है ।

     गौरतलब है वर्ष 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक ऐतिहासिक निर्णय (SLP(C) No. 10723/2012) के तहत प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) और मुंबई उच्च न्यायालय के उस फैसले को खारिज कर दिया और नौसेना (मुंबई)  के  आरोपी कर्मचारी की खिलाफ विभागीय कार्रवाई और सजा का आदेश निरस्त कर दिया जिसमें नौसेना ने यह दलील दी गयी थी की कर्मचारी अनपढ़ नहीं है इसलिए उसे अंग्रेजी में आरोप पत्र जारी किया गया । मामला नौसेना (मुंबई)  में काम  करने वाले मिथिलेश कुमार सिंह ने एक मामले में अपने खिलाफ विभाग की और से जारी आरोप पत्र हिंदी में देने की मांग से संबन्धित था । इस फैसले के जरिये सर्वोच न्यायालय ने एक जरूरी संदेश दिया है, जिसे नीतिगत रूप देने की पहल होनी चाहिए । 

    उल्लेखनीय है कि  1965 में कैबिनेट का एक निर्णय आया था और इसमें कहा गया था कि उच्च न्यायालय  और उच्चतम न्यायालय में हिंदी  में किस तरह काम  हों, उसके बारें में भारत का प्रधान न्यायधीश राय  दें । प्रधान न्यायधीश के प्रतिकूल राय देने के कारण उच्च न्यायपालिका  में हिंदी के प्रयोग का प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाया ।  दिसंबर 2015 में एक जनहित याचिका पर विचार करते हुए भारत के प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली एक तीन सदस्य खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि सुप्रीम कोर्ट की भाषा अँग्रेजी ही है ।

    यहाँ यह विचारणीय है कि संसद में सांसदों को अंग्रेजी के अलावा संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित सभी भारतीय भाषाओं में बोलने का अधिकार है जिसका बाकी सांसदो को तत्काल अनुवाद उपलब्ध कराया जाता है । अनुवाद की इसी व्यवस्था के तहत एवं   संविधान के अनुछेद 348 के खंड 1 में संशोधन द्वारा यह प्रावधान किया जाना चाहिए कि  सुप्रीम कोर्ट और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाहियां  कम से कम एक भारतीय भाषा में हो । 

 

प्रवीण कुमार झा

 

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