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आखिर किस दिशा में जा रहे हैं हम???

आखिर किस दिशा में जा रहे हैं हम???
कोई जीव अपनी जड़ों से नफरत करके कभी नहीं पनप सकता

कुछ निहित उपद्रवी तत्वों को अंधकार से प्रकाश में लाओ मां..!!

जब “अल्लाह हो अकबर” बोला जाएगा, तभी धर्म-निरपेक्षता कायम रहेगी?

सुरेश त्रिपाठी

असतो मा सदगमय ॥ तमसो मा ज्योतिर्गमय ॥ मृत्योर्मामृतम् गमय ॥

क्या वास्तव में सरकारी/गैरसरकारी/स्कूलों/केंद्रीय विद्यालयों में अध्यापकों द्वारा विद्यार्थियों के साथ सुबह इकठ्ठा होकर की जाने वाली यह प्रार्थना “सांप्रदायिक” है?

स्कूलों/विद्यालयों में संस्कृत और हिंदी में प्रार्थना के निर्देश को धार्मिक निर्देश मानते हुए सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने इसकी जांच कराने की बात कहते हुए पूरा मामला पांच जजों की बड़ी संवैधानिक बेंच को रेफर कर दिया है. इसके साथ ही न्यायमूर्ति नरीमन ने इसे बुनियादी महत्व का मामला भी बताया है. न्यायमूर्ति रोहिंटन एफ. नरीमन की अगुवाई वाली दो सदस्यीय पीठ ने केंद्रीय विद्यालयों में सुबह की प्रार्थना सभा में संस्कृत और हिंदी में प्रार्थना कराए जाने के विरुद्ध दाखिल याचिका पर सुनवाई करने के दौरान यह निर्णय दिया है.

याचिका में मांग की गई है कि स्कूलों में धर्म पर आधारित प्रार्थना को बंद कराया जाए, क्योंकि यह असंवैधानिक है. सोमवार, 28 जनवरी को इस मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि संस्कृत के श्लोक ‘असतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय..’ कोई धार्मिक उपदेश नहीं है, बल्कि यह सार्वभौमिक सत्य है. इसे सभी धर्मों और मान्यताओं में माना जाता है. इस पर जस्टिस नरीमन ने कहा कि लेकिन यह श्लोक तो सीधे उपनिषद से लिया गया है. उनके इस सवाल पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सिर्फ अकेले इसे धार्मिक निर्देश नहीं कहा जा सकता है. उन्होंने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट अथवा भारतीय न्यायपालिका का अधिकारिक “लोगो” (चिन्ह) भी तो भगवदगीता से लिया गया है, जिसमें “..यतो धर्मस्य, ततो जय: लिखा हुआ है, यानि ‘जहां धर्म है, वहां विजय है’. उन्होंने यह भी कहा कि इसमें धार्मिक या सांप्रदायिक जैसा कुछ भी नहीं है.

इस मामले में एसजी तुषार मेहता ने यह भी कहा कि इस श्लोक में जो लिखा गया है वह सार्वकालिक सत्य है, जिसे सभी पंथों के लोग मानते हैं. यह महज इसलिए धार्मिक नहीं हो जाता, क्योंकि यह संस्कृत में लिखा है. उन्होंने कहा कि क्रिश्चयन स्कूलों में ‘ईमानदारी सबसे अच्छी नीति होती है’ लिखा होता है. क्या इसका मतलब यह माना जाना चाहिए कि यह उक्ति धार्मिक है?

गौरतलब है कि अगर भाषा और लिपि को सांप्रदायिक नजरिये से देखा जाएगा, तो फिर उर्दू, अंग्रेजी को पूरी तरह से प्रतिबंधित करना पड़ेगा.

सुप्रीम कोर्ट के “लोगो” में भी गीता का श्लोक ‘यतो धर्मस्य, ततो जय:’ लिखा हुआ है. अब सवाल यह उठता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट अपने “लोगो” से गीता का यह श्लोक हटाने पर भी विचार कर रहा है?

“असतो मा सदगमय ॥

तमसो मा ज्योतिर्गमय ॥

मृत्योर्मामृतम्ग गमय॥“

इस श्लोक के शब्दों से स्पष्ट है कि इसमें विद्या और ज्ञान की देवी सरस्वती अथवा एकमेव सार्वभौम सत्ता “ईश्वर” से हम प्रार्थना करते हुए कहते हैं, हे ज्ञान की देवी अथवा हे ईश्वर, “(हमको) असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो.”

केंद्रीय विद्यालयों में होने वाली यह प्रार्थना क्या वास्तव में सांप्रदायिक और हिन्दू धर्म का प्रचार करने वाली है?

यदि थोड़ी देर के लिए यह मान भी लिया जाए कि ऐसा ही है. तब शर्त यह है कि उससे पहले याचिकाकर्ता और सभी जजों को इस बात पर सहमति देनी पड़ेगी कि “अन्य धर्म/पंथ ‘असत्य से सत्य की ओर’ और ‘अंधकार से प्रकाश की ओर’ ले जाने की सीख नहीं देते हैं.”

अब यदि संस्कृत और हिंदी भाषाएं, हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व करती हैं, तो तथाकथित सेक्युलर प्रार्थना ऐसी होनी चाहिए, जिसमें उर्दू, अरबी, फारसी, अंग्रेजी, हिन्दी, संस्कृत, हिब्रू, पाली आदि-इत्यादि सारी भाषाओं के शब्द हों.

क्या ऐसी कोई भाषा दुनिया के किसी देश में है? क्या ऐसी कोई भाषा इस दुनिया में कहीं पर भी अस्तित्व में है? और तब इस बात की क्या गारंटी है कि उसमें इस देश की तमाम क्षेत्रीय भाषाओं/बोलियों, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, अवधी, भोजपुरी, मैथिली, राजस्थानी, गुजराती, कश्मीरी, पंजाबी, हिमाचली, असमी, बंगाली, मराठी, इत्यादि को भी शामिल किए जाने की मांग नहीं उठेगी?

आखिर, हम किस दिशा में जा रहे हैं कि भारत माता की जय, राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान, असतो मा सदगमय, इन सबके उद्घोष से इस देश की तथाकथित धर्मनिरपेक्षता खतरे में आयी जा रही है? ये कैसी धर्मनिरपेक्षता है? क्या इस धर्मभीरु देश में धर्मनिरपेक्षता तभी कायम रहेगी, जब स्कूलों, मंदिरों, घरों, हर जगह से दिन में तीन बार “अल्लाह हो अकबर” और एक बार ‘यीशु इज ग्रेट’ बोला जाएगा? एक बात ध्यान रहे दुनिया का कोई भी जीव अपनी जड़ों से नफरत करके कभी पनप नहीं सकता.

यहां यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इस देश का बहुसंख्यक कायरता की हद तक सहिष्णु है. इसीलिए वह अपनी धार्मिक-सामाजिक परंपराओं, मान्यताओं, संस्कारों, रीति-रिवाजों, त्योहारों इत्यादि के लिए अल्पसंख्यकों की दया का मोहताज होता चला जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट भी बहुसंख्यकों के साथ न्याय नहीं कर रहा है, बल्कि वह भी कुछ दुष्ट प्रवृत्तियों की ही तरह देश, समाज और सत्ता पर हावी होने की कोशिश कर रहा है. यदि बहुसंख्यकों को दबाने और साजिशपूर्ण तरीके से धीरे-धीरे कायर बनाकर उन्हें खत्म करने की आजादी के बाद से चली आ रही इस कुटिल राजनीति के विरुद्ध शीघ्र ही जोरदार आवाज नहीं उठाई गई, तो निकट भविष्य में इस देश को भीषणतम गृहयुद्ध से कोई नहीं बचा पाएगा.

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