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कांग्रेस और भाजपा के बीच महायुद्ध में कांग्रेस ने तीन राज्यों में जीत की बाजी मार ली है

कांग्रेस और भाजपा के बीच महायुद्ध में कांग्रेस ने तीन राज्यों में जीत की बाजी मार ली है लेकिन यह जरूरी नहीं कि 2018 में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम जैसे राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव के नतीजे 2019 के लोकसभा चुनाव पर असरकारी हों। ऐसा मानना है कि बीजेपी के लिए हिंदी प्रदेशों में अच्छा प्रदर्शन करना केंद्र में सरकार बनाने के लिए जरूरी होगा।
विधानसभा चुनाव के नतीजों को लेकर 2019 के चुनाव में भाजपा के प्रदर्शन पर कयास भी लगाए जा रहे हैं। राजनीति में आने से पहले चुनाव विश्लेषक रहे योगेंद्र यादव अपने लेख में कहते हैं कि हिंदी प्रदेश के राज्यों में खराब प्रदर्शन के बाद भाजपा की 2019 के लोकसभा चुनाव में 100 के आसपास सीटें कम हो सकती हैं। पर सीएसडीएस-लोकनीति में यादव के सहयोगी रहे संजय कुमार का विश्लेषण इससे इतर है। उनका मानना है कि माइक्रो मैनेजमेंट के कारण भाजपा को इस तरह का घाटा नहीं होगा। 2018 में जो भी परिणाम आएं वह जरूरी नहीं है कि वे 2019 के ट्रेंड सेटर हों।
2014 में बड़े अंतर से जीती गईं सीटें ज्यादा
साल 2014 के चुनाव परिणामों की बात करें तो भाजपा ने कुल 282 सीटों में से 40 फीसदी से ज्यादा सीटों को 20 फीसदी से ज्यादा अंतर से जीता था। वहीं महज एक चौथाई सीटें थीं जहां जीत का अंतर दस फीसदी से कम था।
बड़ी जीत वाली सीटों पर फिर जीत की संभावना ज्यादा
साल 1984 से 2014 के बीच लोकसभा चुनाव में जीत हार के आंकड़ो का विश्लेषण बताता है कि जिन सीटों पर बड़े अंतर से जीत मिली वहां अगले चुनाव में जीत की भी संभावना बनी रहती है। हालांकि 2004-09 और 1984-1989 में इसका अपवाद दिखाई देता है। हालांकि 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति लहर में कांग्रेस को बंपर जीत मिली थी और कांग्रेस उसे 1989 में कायम नहीं रख पाई।
भाजपा की बड़ी जीत थी 2014
2014 की जीत भी भाजपा के लिए बड़ी जीत थी क्योंकि 30 सालों में किसी पार्टी को पहली बार सरकार चलाने के लिए 282 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत मिला था।
एनडीए (NDA) के घटक दलों के बीच सीट बंटवारे का मामला रालोसपा (RLSP) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के अगले कदम पर निर्भर करेगा। हालांकि, एनडीए में चल रही तनातनी ने सीट बंटवारे की पटकथा पहले ही लिख दी है। जानकारी के अनुसार, उपेंद्र कुशवाहा के एनडीए से नाता तोड़ने की स्थिति में इस गठबंधन में जदयू, भाजपा और लोजपा के रूप में तीन ही घटक दल बचेंगे।
ऐसी नौबत आने पर दो फॉर्मूला तय किए जाने की चर्चा है। पहला फॉर्मूला 18-18 और चार का जबकि दूसरा 17-17 और छह का है। अब इनमें से कौन सा फॉर्मूला लोकसभा चुनाव 2019 में एनडीए जमीन पर उतारेगा यह लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान पर निर्भर करेगा। बताया जा है कि पासवान के समक्ष दो विकल्प हैं। यदि वे लोकसभा चुनाव न लड़कर राज्यसभा जाना चहों तो लोजपा के चार प्रत्याशी लोकसभा चुनाव के मैदान में उतरेंगे।अगर रामविलास पासपान खुद भी लोकसभा चुनाव लड़ें तब उनके दल को कुल छह सीटें मिल सकती हैं। तब भाजपा और जेडीयू में 17-17 सीटें बंटेंगी। गौरतलब है कि जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से दिल्ली में गत 26 अक्टूबर को मुलाकात की थी। उसी दिन शाह ने प्रेस कांफ्रेंस कर यह ऐलान किया था कि बिहार में बीजेपी और जेडीयू बराबर-बराबर सीटों पर चुनाव लड़ेंगी।
हालांकि ध्यान देने वाली बात यह है कि गठबंधन को चुनाव के बाद भी हो सकता है. चुनाव के बाद देखा जाएगा कि कौन कितनी सीटें लेकर आता है. ज़रूरत पड़ने पर गठबंधन बनाया जा सकता है.

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