“वेदों की सार्वभौमिकता” पर गोष्ठी सम्पन्न

“वेदों की सार्वभौमिकता” पर गोष्ठी सम्पन्न

वेद देश-काल से अलग सबसे प्राचीन ग्रंथ है -आचार्य हरिओम शास्त्री

वेद ज्ञान मानवमात्र के लिए है -विद्यासागर वर्मा(पूर्व राजदूत कजाकिस्तान

गाजियाबाद,मंगलवार 26 अक्टूबर 2021, केन्द्रीय आर्य युवक परिषद के तत्वावधान में “वेदों की सार्वभौमिकता” पर ऑनलाइन गोष्ठी का आयोजन किया गया ।यह करोना काल में 303 वां वेबिनार था।

वैदिक विद्वान आचार्य हरिओम शास्त्री ने कहा कि जो चीज सबसे प्राचीन होती है उसका वर्णन बाद के सभी ग्रन्थों में होता है।वह किसी भी देश,काल,भाषा, संस्कृति और समूह में बंधी नहीं होती है।इस तरह देखा जाए तो दुनिया के सभी ग्रन्थों में वेदों के नाम का वर्णन है। जिसका वर्णन समय समय पर विभिन्न देशों के विचारकों, दार्शनिकों व वेदभाष्यकारों ने भी किया है। ऋषि दयानन्द सरस्वती महाराज ने भी कहा है -“जो ईश्वरोक्त सत्यविद्याओं से युक्त ऋक्संहितादि चार ग्रंथ हैं, जिनसे मनुष्यों को सत्यासत्य का ज्ञान होता है उनको “वेद”कहते हैं।बाद के वैदिक शास्त्रों में” वेदोऽखिलो धर्ममूलम्” अर्थात् वेद सभी धर्मों (धारण करने योग्य सिद्धांतों)का मूल ग्रन्थ है, ऐसा कहा गया है।संत गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है -“बंदऊं चारिऊ वेद,भव वारिधि बोहित सरिस”। अर्थात् मैं संसार सागर से पार उतारने वाले चारों वेदों की वन्दना करता हूं। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम जी ने भी शबरी को नवधाभक्ति बताते हुए कहा है कि – मन्त्र जाप सो दृढ़विश्वासा , पंचम भजन सो वेदप्रकाशा । अर्थात् दृढ़विश्वास के साथ वेदों के मन्त्रों का जप करना ही पञ्चम भक्ति है।इसलिए अन्य सभी ग्रन्थ एक विशेष व्यक्ति, स्थान, भाषा, मान्यता, सभ्यता और संस्कृति की बात करते हैं और छल-बल- धन और हत्याकांड के द्वारा अपनी बातें मनवाने की आज्ञा भी देते हैं परन्तु वेद किसी भी देश,काल, स्थान, समुदाय, संस्कृति और सभ्यता की बात न कहकर मानवमात्र के उस समय की भाषा में बात करते हैं जो भाषा किसी देश विशेष की भाषा न होकर अखिल मानवमात्र की भाषा थी जिसे वैज्ञानिक वैदिक संस्कृत कहते हैं।यजुर्वेद में भगवान स्वयं ही कहते हैं-ओ३म् यस्मिन् ऋच:साम यजूंषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवारा:।यस्मिंश्चितं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मन:शिवसंकल्पमस्तु।अर्थात् -जिस मेरे मन में ऋग्वेद,यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद रथ में जुड़े अरों के समान हैं,वह मेरा मन शिव अर्थात् कल्याणकारी संकल्पों वाला हो।गायत्री मंत्र,ओं विश्वानि देव—-,ओं अग्निमीडे पुरोहितं—–,ओं स्वस्ति पन्थामनुचरेम—–,ओं यज्जाग्रतो—-,ओं भद्रं कर्णेभि: —-आदि वेदों के 20,000 से अधिक मन्त्रों में सार्वभौम घोषणा, प्रार्थना की गई है। किसी भी देश, काल और सभ्यता का व्यक्ति अपने लिए और अपने परिवार,देश, संस्कृति के लिए ये प्रार्थनाएं कर सकता है। अतः वेदों के समस्त भारतीय व विदेशी भाष्यकारों ने वेदों को ही सार्वभौमिक ग्रन्थ कहा है। फिर चाहे वह सायणाचार्य हों,उव्वट हों,कीथ हों, ग्रिफिथ हों, स्वामी दयानन्द जी हों या अन्य भारतीय भाष्यकार हों।

कजाकिस्तान के पूर्व राजदूत विद्या सागर वर्मा ने कहा कि वेद ज्ञान मानवमात्र के लिए है,यह विश्व के सबसे प्राचीन ग्रन्थ है।

केन्द्रीय आर्य युवक परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिल आर्य ने गोष्ठी का संचालन करते हुए कहा कि वेदों की ओर वापिस लौट कर ही विश्व का कल्याण सम्भव है।

राष्ट्रीय मंत्री प्रवीण आर्य ने कहा कि महर्षि दयानंद जी ने वेदों के पठन पाठन पर जोर दिया है।

गायिका रजनी गर्ग,प्रवीण आर्य, ईश्वर देवी,रविन्द्र गुप्ता,संध्या पाण्डेय, सुखवर्षा सरदाना,मृदुला अग्रवाल,रेखा वर्मा,कमला हंस, ईश आर्य,कुसुम भंडारी आदि ने भजन प्रस्तुत किये ।

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