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👉 *अपने दोषों को भी देखा कीजिए!

*यह भी देखिये कि ऐसी ही अपेक्षा दूसरे भी आपसे रखते हैं। जिस प्रकार आपको प्रशंसा प्रिय है।* वैसे ही दूसरों को भी। आप दूसरों से सहयोग और सहानुभूति चाहते हैं वैसे ही आपके मित्र-बन्धु पड़ौसी भी आपसे ऐसी ही अपेक्षा रखते हैं। *स्वयं औरों से सेवा लेकर दूसरों को अँगूठा दिखाने का संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाने से आप औरों की नजरों से गिर जायेंगे।* यदि चाहते हैं आड़े वक्त आपकी कोई मदद करे तो औरों के दुःख में हाथ बंटाइये, और सहानुभूति प्रकट कीजिये। *औरों के साथ उदारतापूर्वक व्यवहार करने से ही उनका हृदय जीत सकते हैं। सहयोग और सहानुभूति प्राप्त कर सकते हैं।* इस संसार में सर्वत्र क्रिया की प्रतिक्रिया चलती है। “दो तो मिलेगा” की ही नीति सच्ची और व्यवहारिक है।

*कई बार ऐसा होता है कि कोई बात आप भूल जाते हैं। कोई बात आपकी स्मरण शक्ति से उतर जाती है।* इसका दण्ड आप अपने घर वालों, बच्चों और प्रियजनों को देने लगते हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि आप यह मान बैठते हैं कि मैंने बच्चे को अमुक वस्तु लाने के लिए कह दिया था, वस्तुतः आपने कहा नहीं था। *कभी-कभी अस्पष्ट या अधूरे आदेशों को दूसरा ठीक प्रकार समझ नहीं पाता और आप यह समझ बैठते हैं कि हमारी अवज्ञा की गई है।*

*जिसे आदेश दिया था यह अपनी असमर्थता, प्रकट करता है तो इसे आप उसकी अवज्ञा मान कर दण्ड देते हैं, झिड़कते और भला-बुरा कहते हैं।* भूल जाने की बात मानवीय है। आपकी ही तरह दूसरा भी मानसिक कमजोरी के कारण भूल कर सकता है। *आप यहीं मान लें कि भूल हमसे या दूसरों से हो सकती है तो क्यों किसी को दण्ड देंगे, क्यों दुर्भाव पैदा करेंगे?* मानसिक सन्तुलन बनाये रखने के लिए इस प्रकार करना ही अच्छा होता है।

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