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सच्ची एकाग्रता

सच्ची एकाग्रता
एक बार बादशाह अकबर अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए घूमने निकले।
उस समय उनके साथ मात्र चार दरबारी थी । नमाज का समय हो गया था । गांव का मार्ग छोड़कर कोई ऐसी जगह नही थी जहां नमाज अदा की जा सके . इस लिए मार्ग पर ही जायेनमाज (नमाज पढ़ने के लिए बिछाई जाने वाले चटाई) बिछा दी गई ।

बादशाह अकबर नमाज पढ़ने लगे जबकी उनके चारों दरबारी निकट के पेड़ों की ओर चले गए।
तभी वहां एक युवती पहुची । उसे किसी चीज का भान नही था। वह सीधे चलते हुए बादशाह अकबर के जायेनमाज पर पैर रखती हुई आगे बढ़ गई । बादशाह अकबर को बहुत क्रोध आया लेकिन नमाज मे होने से वे कुछ न कहा सके । कुछ देर बाद वह युवती वापस लौटी इत्तफाक से बादशाह अकबर वहीं थे । नमाज भी पूरी हो चुकी थी । उन्होंने उसे अपने पास बुलाकर डांटा हे मूर्ख औरत । क्या तुझे नही दिखा कि मैं नमाज पढ़ रहा हु जो तु जायेनमाज को कुचलती हुई चली गई ।

युवती बोली जहां पनाह । मेरे शौहर परदेश गए है। अनेक वर्षा के बाद जब उनके आने की खबर मिली तो मै अपनी सुद बुध खोकर उनसे मिलने को चल पड़ी । रास्ते मे आपकी जायेनमाज पर कब पैर पड़ गया मै यह जान भी न सकी । किंतु आप तो अल्लाह की इबादत कर रहे थे । उसमे अपना ध्यान लगाए हुए थे फिर आपने मुझे कैसे देखे लिया।

युुवती की बात सुनकर बादशाह अकबर को अ्पनी भूल का एहसास हुआ ।
उन्होंने उसे माफ करके सच्चे मन से इबादत करने का संकल्प लिया।
यदि मनुष्य इबादत अथाव उपासना आदि मे सच्ची एकाग्रता को छोड़कर अन्य बातों मे रम जाता है तो वह लाभ के बजाय हानि पंहुचाती है। आंतरिक भााव से परम पिता परमेश्वर को चाहना ही साधना का रहस्य है। सच्ची एकाग्रता से परिपुर्ण प्रार्थना ही भक्त को परमेश्वर तक पहुंचाती है।

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