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*राजनीति जो शायद सब को ना भाये*

एक बहुत प्रसिद्ध निर्गुण गीत की एक महत्वपूर्ण लाइन है,

“सदा ना रहा है, सदा ना रहेगा, जमाना किसी का,
नही चाहिए दिल दुखाना किसी का”

पर कोई इस बात को समझता कहा है ?

वक्त कैसे कैसे दिन दिखा देता है यह दोनों तस्वीरे इसका जीता जागता उदाहरण है । खासकर राजनीति में कब किसके अच्छे दिन या किसके बुरे दिन आ जाये किसी को पता नही होता है । श्री आडवाणी जी जब 1991 में गांधीनगर से नामांकन दाखिल कर रहे थे तो मोदी जी बगलगीर बनकर साथ थे, अमित शाह जी पीछे खड़े होकर पूरी प्रक्रिया को झांककर देख रहे थे शायद अपने आने वाले भविष्य को झांक रहे थे ,।
आज जब मोदी जी और शाह जी के राजनीतिक सितारे चमक रहे है तो उन्ही आडवाणी जी का टिकट गांधीनगर से राष्ट्रीय चौकीदार मोदी जी व शाह जी की वजह से ही कट गया है जो कभी इन्ही की उंगलियां पकडर राजनीति की सीढ़ियां चढ़े थे। अगर आडवाणी जी दीवार बनकर अटल जी के सामने न खड़े होते तो 2002 के बाद ही मोदी जी का राजनीतिक करियर समाप्त हो जाता । पर जिन आडवाणी जी ने मोदी जी का सबसे बुरे समय मे साथ दिया अब वही आडवाणी जी वर्तमान के झरोखे से अपना अतीत और भविष्य झांक रहे हैं।

राजनीति भी गजब की चीज है जो हाथ पकड़ाकर चलना सिखाये पहले उसी के हाथ काट दो, पंगु बना डालो ।

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