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धैर्य और विनम्रता

किसी शहर में एक संत रहते थे वे प्रतिदिन साड़ी आदि बुनकर बाजार में बेच देते थे । इसी से उसकी रोजी रोटी चलती थी एक दिन एक धनी य़ुवक बाजार में उस संत के पास पहुचा ।वह संत को ढोगी समझता था । अत: उसने उनकी परिक्षा लेने का निर्णय किया । युवक ने संत से एक साड़ी का दाम पुछा संत ने एक रुपये बताए ।युवक ने उस साड़ी के दो टुकड़े कर दिए और फिर एक का दाम पुछा संत ने आठ अना बता दिया युवक ने उस साड़ी के पुन: दो टुकड़े कर दिय और एक का मुल्य पुछा संत ने सान्त चिन्त से चार अना बता दिया
इस प्रकार उस धनी युवक ने साड़ी के टुकड़े –टुकड़े कर दिया जीससे उसका दाम भी नग्णय होता । चला गया पंरतु संत चुप रहे तब युवक ने संत को दो रुपये हुए कहा ऐ रहा तुम्हारा कपड़े का मुल्य संत धैर्यपुर्वक बोला बेटा जब तुमने साड़ी खरीदी ही नही तो मैं उसका दाम कैसे ले सकता हु युवक आश्चर्य से संत को मुंह दिखाने लगा उससे अपने कूत्य पर ग्लानि होने लगी संत बोला बेटे ये दो रुपये क्यु उस मेहनत का दाम दे सकते है । जो इस साड़ी में लगी है .इसके लिए कीसान ने साल भर खेत मे पसीना बहाया है । मेरी पत्नी ने उससे कातने और धुनने रात दिन एक किए है । मेरे बेटे उससे रंगा है । और मैने उससे साड़ी का रुप दिया है य़ह सुनकर उस युवक की आखो में आसु झलक गए उनसे संत से क्षमा मंगी और ऐसा व्यवहार किसी के साथ न करने की प्रतिज्ञा की फिर वह बोला आप मुझे पहले ही रोक कर यह बात कह सकते थे फिर अपने ऐसा क्यो नही किया संत ने कहा यदी मेने तुम्हे पहले रोक दिया होता तो तुम्हारा संयम पुरी तरह नष्ट नही होता तुम शिक्षा को यथेष्ट तरीके से आत्मसात नही कर पाते धैर्य विनम्रता के साथ दिय गय शिक्षा व्यक्ति में अपूर्व परिवर्तन कर दिय है । इससे इसका दुर्गुणाँ का नास होकर सुंदर गुणो को विकास होता है ।

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