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धर्म का मर्म

धर्म का मर्म
एक दिन तपोनिष्ठ कौशिक एक वृक्ष के बैठकर वेद-कर रहे थे, तभी वृक्ष पर बैठ एक पक्षी ने बीट कर दी। ऊपर देखने पर उन्हें एक बगुला दिखाई दिया। कौशिक को उस पर बड़ा क्रोध आया और वह भस्म होकर नीचे गिर पड़ा। लेकिन क्रोध शांत होने पर महर्षि कौसिक को बड़ा पछतावा हुआ। फिर वे भिक्षा मांगने के लिए एक गांव की ओर चल पड़े।
भोजन की याचना मं कौशिक एक व्दार पर बड़ी देर तक खड़े रहे। गहिणी पति की सेवा कर रही थी। अत: विलंब से आई और क्षमा मांगते हुए भिक्षा देने लगी। कौशिक को फिर क्रोध आ गया। वह स्त्री कौशिक के तमतमाए चेहसे को देखकर विनम्र भाव से बोली,” आपका क्रोध पति की सेवा में रत-सती का कुछ नहीं बिगाड़ सकता। महात्मन्! आप धर्म का मर्म नहीं जानते। इसलिए उचित यह होगा कि आप मिथिला के धर्मव्याध से उपदेश ग्रहण करें।“
स्त्री की बात सुनकर महर्षि कौशिक मिथिला पहुंचे। जब उन्होंने धर्मव्याथ को देखा तो उन्हें बड़ा अचरज हुआ। धर्मव्यध एक कसाई थे जो अपनी दुकान पर बैठे मांस का वक्रय कर रहे थे। महर्षि कौशिक को भ्रमित देखकर वे बोले,” भगवन! क्या उस सती गृहिणी मे आपको मेरे पास भेजा है? आइए, आप मेरे घर चलें।“
धर्मव्यध के घर पहुंचकर कौशिक ने देखा कि पहने उन्होंने अपने माता-पिता की अपूर्व श्रध्दा से सेवा की। फिर निवृत्त होकर धर्मव्यध ने कौशिक को जीवन-लक्ष्य और कर्तव्य का उपदेश दिया। कौशिक तप-वेदाध्ययन छोड़कर अपने घर लौटे और माता-पिता की सेवा करके अपना कर्तव्य पालन करने लगे।
वस्तुत:धर्म की परिभाषा नहीं की जा सकती। कई स्थनों पर विरोधाभासी विचार देखकर बुध्दि भ्रमित हो जाती हैं। अत: कौन से कर्म करने योगग्य हैं और कौन से कर्म त्याज्य हैं- यह सब जानना दुष्कर है। लेकिन यह सत्य है कि अपने परिजनों की सेवा सर्वोपरि है। यही धर्म का मर्म हैं।

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