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*जिसका जैसा पद उसकी वैसी भाषा*!

एक बार एक राजा अपने मंत्री और अंगरक्षक के साथ जंगल में शिकार खेलने गए। शिकार खेलते-खेलते राजा,मंत्री और अंगरक्षक अलग-अलग रास्ते पर चले गए और अब शाम होने को आ गयी। जंगल में अनजान रास्ता इसके साथ घनघोर अंधेरा गहराता गया। राजा अपने मंत्री और अंगरक्षक को आवाज लगाते हुवे जंगल से बाहर निकलने का रास्ता ढूढ़ने लगे, कुछ दूर आगे बढ़ने के बाद राजा को एक झोपड़ी में जलता जलता हुआ दिया दिखाई दिया। राजा झोपड़ी के निकट पहुंचकर झोपड़ी में साधनारत जन्मांध साधु को दंडवत प्रणाम करने के बाद कहा कि साधु महाराज यदि आपकी साधना में कोई असुविधा न हो तो इस जंगल मे भटके हुवे राही को जंगल से बाहर निकलने का रास्ता बतानें की कृपा करें। साधु महाराज राजा को जंगल से बाहर निकलने का रास्ता बताकर फिर अपनी साधना में लीन हो गए। थोड़ी देर बाद मंत्री भी साधु महाराज के पास पहुंचा और साधु महाराज को प्रणाम कर जंगल से बाहर निकलने का रास्ता पूंछा, साधु महाराज ने मंत्री को रास्ता बताते हुवे कहा कि अभी थोड़ी देर पहले आपके राजा भी रास्ता पूँछकर आगे बढ़े है। फिर थोड़ी देर बाद राजा का अंगरक्षक भी साधु के पास जंगल से बाहर निकलने का रास्ता पूंछने पहुंचा और अपने दंड को जमीन पर ठनकाते हुवे कहा कि ओ साधु जंगल से बाहर निकलने का रास्ता बताओं। साधु महाराज ने अंगरक्षक को भी रास्ता बताते हुवे कहा कि अभी थोड़ी देर पहले आपके राजा और मंत्री भी जंगल से बाहर निकलने का रास्ता पूँछकर आगे गए है। अंगरक्षक के जाने के बाद साधु महाराज का सेवक साधु से पूछा कि आप तो देख नहीं सकते फिर आप राजा, मंत्री और अंगरक्षक को कैसे पहचान गए, क्योंकि साधु ने राजा के जाने के बाद मंत्री को रास्ता बताते हुवे यह कहा था कि अभी आपके राजा भी रास्ता पूँछकर आगे बढ़े है फिर अंगरक्षक को भी रास्ता बताने के बाद यह कहा कि अभी थोड़ी देर पहले आपके राजा और मंत्री भी रास्ता पूछ कर आगे गए है। साधु जन्मांध थे इसलिए सेवक संशय में पड़ गया कि बिना देखे राजा,मंत्री और अंगरक्षक को महाराज ने कैसे पहचान लिया। इसी संशय को जानने के लिए सेवक ने साधु से पूछा। साधु महाराज ने सेवक को समझाते हुवे कहा कि व्यक्ति की भाषा ही उसका प्रतिबिम्ब है। कोई भी इंसान जब किसी से बातचीत करता है तो उसकी भाषा से ही उसका पद और व्यक्तित्व झलक जाता हैं। 🙏

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