गणहित ही सर्वोपरि

गणहित ही सर्वोपरि

एक बार महात्मा बुध्द अपने कुछ शिष्यों के साथ किसी गांव में जा रहे थे। संध्या होने वाली थी। उस गांव के एक किसान ने महात्मा बुध्द को ग्रामवासियों की ओर से प्रव्रज्या कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया था। किसान ने सारी तैयारियां पूरी कर ली थी। इसी बीच किसान को पता चला कि उसके पशुओं में एक बैल कम है। यह खबर उसके लिए बहुत कष्टदायक थी।
अगले दिन किसान को गण की सार्वजनिक भूमि पर सेवा करनी थी। उस गण का यह नियम था कि सार्वजनिक खेती की जमीन पर हर ग्रामवासी वर्ष में एक दिन सेवा करे और जमीन व्दारा पैदा हुई फसल का उपयोग अतिथियों एंव निराश्रितों की साहयता के लिए किया जाए। इस सेवा में त्रुटि होने पर कठोर दंड का भी प्रावधान था।
किसान ने पहले अपने बैल को खोजना उचित समझा। वह प्रव्रज्या कार्यक्रम की जिम्मेदारी ग्रामवासियों पर छोड़कर बैल की खोज में जंगल की ओर निकल गया। बैल को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते रात गुजर गई, सुबह उसे बैल मिल गया। अपने भाग्य और गण के प्रति जिम्मेदारी आदि विचारों में डूब वह किसान जब अपने घर पहुंचा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। महात्मा बुध्द उसके घर पर बैठे उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने प्रव्रज्या कार्यक्रम को टाल दिया था। किसान महात्मा बुध्द के चरणों में गिर पड़ा और उनसे क्षमा मांगने लगा। महात्मा बुध्द ने उसे उठाकर अपने पास बिठाया। फिर सबको प्रव्रज्या दी औऱ आशीर्वाद देकर लौट गए।
रास्ते में एक शिष्य ने महात्मा बुध्द से पूछा,” क्या एक नादान और श्रध्दाहीन व्यक्ति के लिए प्रव्रज्या कार्यक्रम टालना ठीक था?”
महात्मा बुध्द ने कहा,” वत्स! वह न तो नादान है और न ही श्रध्दाहीन। घटनाक्रम मैं फंसे उस किसान को सामाजिक कर्तव्य और स्वयं की प्रव्रज्या में से किसी एक का चुनाव करना था। उसने सामाजिक कर्तव्य को प्राथमिकता दी। मैंने उसके इस निर्णय का स्वागत किया। एक गृहस्थ और गण के सदस्य के रूप में वह लोकधर्म के मापदंड पर खरा उतार है क्योंकि गणहित ही सर्वोपरि है।“

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