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कांग्रेस इतनी सड़कछाप कैसे हो गई? आलाकमान कौन…?

कांग्रेस इतनी सड़कछाप कैसे हो गई? आलाकमान कौन…?

आजादी के आंदोलन में महती भूमिका निभाने वाली कांग्रेस यूं सड़कछाप कैसे हो गई?मात्र एक सौ तैंतीस साल में बलिदान, त्याग की पहचान रखने वाली इस पार्टी में अब आलाकमान जैसे शब्द का क्या मायना बचा है?
पुरानी पीढी अब बेहद कम बची है और जो बचे खुचे हैं वे आज के हालात देख कर गैरत से मर रहे हैं।
तीन राज्यों में मुख्यमंत्री चयन को लेकर जैसा मंजर बना उसने जीत को मातम में बदल कर रख दिया है। निजी स्वार्थ में कांग्रेस के मौजूदा नेताओं ने जिस तरह पार्टी,राष्ट्र,जनहित को नजरअंदाज किया है उसे देख नई पीढी के लिए कांग्रेस की गौरवशाली परम्परा शायद इतिहास की मनगढंत कहानी ही लगेगी। बदलते दौर में यह बदलाव अगर ठीक है तो फिर कांग्रेस में शायद’आलाकमान’ है ही नहीं ।
यूं तो इसे पार्टी का अंदरूनी मसला बता कर पल्ला झाड़ा जा सकता है लेकिन लोकतंत्र का दावा करने वाली कांग्रेस में लोकतंत्र गायब और कबीलाई संस्कृति ज्यादा नजर आ रही है।जनादेश मिलने के दो दिन बाद भी रायशुमारियों के दौर जारी रहें और पल पल स्थितियां बदलें तो संकेत ठीक नहीं माने जा सकते।इसकी या ऐसी दूसरी वजह से पार्टी क्या सड़कछाप शोहदों के टायर फूंकने,शीशे तोड़ने या पार्टी मुख्यालयों के बाहर लात घूंसे चलाने वालों के लिए बची है या देश के मजलूम,किसानों, महिलाओं,असहायों की मदद करने का जज्बा रखने वालों के लिए भी बची है?गहनता से मनन निश्चित ही कांग्रेसजनों को करने की जरूरत है।किसी के दोष गिना कर कांग्रेस और उसके नेता दोषमुक्त नहीं होंगे। भरोसा जता चुके मतदाताओं को इसका जवाब तो देना ही पड़ेगा।साम्प्रदायिक व फासीवादी ताकतों से लड़ाई के लिए क्या कांग्रेस संगठन में त्याग करने वालों का टोटा पड़ गया है? इसका जवाब देश के तीन राज्य ही क्यों,समूचा देश मांगता नजर नहीं आ रहा है? अगर जवाब नहीं दे सकते तो देश की आजादी से गुलामी ही बेहतर थी,भले वो ब्रितानियों की थी या मुगलों की।आवाम को शायद आज के दौर से उस जमाने के दौर में सुकून,शांति, न्याय तो मिला होगा?गुंडागर्दी के ऐसे नजारों के लिए शायद देश आजाद नहीं हुआ था।
–अशोक जैन,स्वतंत्र पत्रकार– 9414211451

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