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कश्मीर में राजनीती से ऊपर उठकर सोचने की जरुरत है

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कश्मीर में राजनीति में ऊपर उठकर सोचने की जरुरत।
सत्ता के लालची नेता, हिन्दुओं को फिर से घाटी में बसाने की बात क्यों नहीं करते?
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21 नवम्बर की रात को जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने विधानसभा को भंग कर दिया। राज्यपाल का कहना है कि कुछ राजनीतिक दल गठबंधन कर सरकार बनाना चाहते थे, जबकि उनका उद्देश्य राज्य में स्थायी सरकार का है। सब जानते हैं कि चार माह पहले भाजपा-पीडीपी के गठबंधन के टूटने के समय ही विधानसभा को भंग करने का आग्रह किया था, लेकिन राज्यपाल ने विधानसभा को तब भंग किया जब भाजपा को दरकिनार कर कांग्रेस, नेशनल कांग्रेस और पीडीपी मिल कर सरकार बनाने की कोशिश कर रहे थे। राज्यपाल के समक्ष सरकार बनाने का दावा पेश किया जाता, इससे पहले विधानसभा भंग कर दी गई। यानि सभी लोग राजनीति कर रहे हैं। आज कश्मीर के जो हालात हो गए हैं उसमें राजनीति से ऊपर उठ कर सोचने की जरुरत है। यदि राजनीति की जाती रही तो कश्मीर हाथ से निकल जाएगा। 22 नवम्बर को ही पाकिस्तान के सेना प्रमुख बाजवा ने कहा है कि हम बड़ी लड़ाई लड़ने को तैयार हैं। सब जानते हैं कि कश्मीर पर पाकिस्तान की बुरी नीयत है। पाकिस्तान के दखल की वजह से ही कश्मीर को हिन्दू विहीन बनाया गया। जो लोग आज कश्मीर में सरकार बनाने का दावा क रहे हैं वो पहले हिन्दुओं को फिर से कश्मीर में बसाने की बात क्यों नहीं करते? जब हमारा देश धर्मनिरपेक्ष है तो फिर कश्मीर में हिन्दुओं को क्यों रहने नहीं दिया जाता? सत्ता के लालची नेता उन चार लाख हिन्दुओं के बारे में सोचे, जिन्हें सब कुछ छोड़ कर कश्मीर से भागना पड़ा। आज ऐसे कश्मीरी अपने ही देश में शरणार्थी बने हुए हैं। राजनीति करने वाले अच्छी तरह समझ लें कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग तभी रह सकता है, जब वहां हिन्दू समुदाय को सुकून के साथ रहे। जब देश के अन्य हिस्सों में हिन्दू-मुसलमान साथ-साथ रह सककते हैं तो फिर कश्मीर में क्यों नहीं? आज हम देख रहे हेैं कि कश्मीर घाटी हिन्दू विहीन होने के बाद एक तरफा हो गई है। सेना की उपस्थिति के बावजूद हालात नि यंत्रण में नहीं आ रहे हैं। महबूबा मुफ्ती फारुख अब्दुल्ला, सैफुद्दीन सोज, गुलाम नबी आजाद जैसे लीडर यदि कश्मीर को भारत में बनाए रखना चाहते है। तो पहले कश्मीर में साम्प्रदायिक सद्भावना का माहौल बनाना होगा। कश्मीर में सरकार बना लेने से कोई मतलब नहीं है। भाजपा ने पीडीपी के साथ सरकार बना कर सबक ले लिया है। भाजपा भी कश्मीर के मुद्दे पर राजनीतिक नजरिया नहीं रखे। जब भाजपा पीडीपी की सरकार गिरी थी तभी विधानसभा को भंग किया जाना चाहिए था। भाजपा आज केन्द्र में सत्ता में है। लेकिन इसके बाद भी हिन्दू वापस कश्मीर नहीं जा सके हैं। हालांकि भाजपा हिन्दुओं को पुनः कश्मीर में बसाने के पक्ष में हैं, लेकिन कोई ठोस कार्यवाही नहीं की है। आतंकवादियों की धमकी के बाद भी कश्मीर में पंचायती राज के चुनाव में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया है। यदि कश्मीर के नेता अपना स्वार्थ छोड़ कर भूमिका निभाएं तो अभी भी हालात सुधारे जा सकते हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाब नबी आजाद, जब राजस्थान आकर हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात कर सकते हैं तो फिर खुद के गृह प्रदेश कश्मीर में हिन्दुओं की चिंता क्यों नहीं करते? मालूम हो कि आजाद इन दिनों राजस्थान विधानसभा चुनाव में सक्रिय हैं। मै। हमेशा अजमेर स्थित सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन की दरगाह का उदाहरण प्रस्तुत करता हंू। भले कश्मीर से चार लाख हिन्दुओं को पीट पीट कर भगा दिया गया हो, लेकिन आज भी हजारों हिन्दू प्रतिदिन दरगाह में जियारत के लिए आते हैं। दरगाह में हिन्दुओं के साथ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं किया जाता। जब हिन्दू ख्वाजा साहब की दरगाह में जियारत कर सकता है तो फिर कश्मीर में क्यों नहीं रह सकता?
एस.पी.मित्तल)

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