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अहिंसा का पाठ

अहिंसा का पाठ
जयपुर के महाराज के दीवान अमर चंद्र जैन की गिनती अत्यंत कुशल प्रशासकों एंव कर्तव्य परायण राजनीतिज्ञों में होती थी। वे अहिंसा के घोर समर्थक औऱ मानवता के पुजारी थे। उन्हें राजपरिवार का विशेष स्नेह प्राप्त था, इसलिए अन्य दरबारी उनसे ईर्ष्या करते थे। वे समय-समय पर उनके खिलाफ महाराज के कान भरते रहते थे।
एक बार महाराज शिकार करने के लिए जाने लगे तो उन्होंने दीवान जी को भी अपने साथ ले लिया। दीवान जी को थोड़ा अजीब सा लगा लेकिन महाराज का आदेश था, इसलिए वे टाल भी नहीं सकते थे।
दोनों जंगल में बड़ी दूर तक निकल गए। जब महाराज ने हिरणों का एक झुंड देखा तो अपना घोड़ा उनके पीछे दौड़ा दिया। आगे-आगे भयभीत हिरण थे, उनके पीछे महाराज का घोड़ा और उनके पीछे दीवान का घोड़ा दौड़ रहा था। दीवान जी सोच रहे थे- क्या बिगाड़ा है इन निरीह-मूक पशुओं ने मनुष्य का? आखिर क्यों इंसान इन्हें अब तक मारता चला आ रहा है। कैसा अविवेकी है यह मनुष्य जो इन निर्बल पशुओं को मारकर अपनी वीरता पर घमंड करता है। ये बेचारे भागकर कहां जाएंगे। जब राजा ही इनके प्राण लेने को आतुर है तो ये अपनी जान कैसे बचाएंगे?
तभी दीवान जी को एक युक्ति सूझी। उन्होंने जोर से पुकारकर कहा,” हिरणो! मैं कहता हूं- जहां हो, वहीं रूक जाओ। जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो बचकर कहां जाओगे।“ असल में दीवान जी ने यह बात महाराज की आंखें खोलने के लिए कही थीं परंतु संयोगवश हिरण अपने आप रूक गए। तब दीवान जी ने कहा,” महाराज! ये हिरण आपके सामने खड़े हैं। इनमें से जितने आपको चाहिए,ले लीजिए।“
अब तो महाराज कभी दीवान जी की ओर देखते तो कभी हिरणों की ओर। वे जैसा इस समय देख रहे थे, वैसा उन्होंने जीवन में पहले कभी नहीं देखा था। अद्भुत और अपूर्व दृश्य था वह। महाराज के दिल में एक हिलोर सी उठी। वे बोले,” दीवान जी! आपने मेरी आंखें खोल दीं। मैं आज से शिकार का त्याग करता हूं। आज से मैं राज्य में हर प्रकार ही हिंसा पर रोक लगाने की कोशिश करूंगा।

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