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अविस्मरणीय उपदेश

अविस्मरणीय उपदेश
एक दिन एक व्यक्ति एक संत के पास गया और बोला,” महाराज! मुझे कोई ऐसा उपदेश दीजिए जो जीवन भर याद रहे। मेरे पास इतना समय नहीं है कि रोज आपके पास आऊं और घंटों बैठकर आपका उपदेश सुनूं।“
संत ने कहा,” ठीक है, मेरे साथ चलो।“
संत के आश्रम के निकट एक श्मशान भूमि थी। संत उस व्यक्ति को वहीं ले गए। वह बहुत घबराया। उसने संत से कहा,” यह आप मुझे कहां ले आए हैं?”
संत ने सहज भाव से कहा,” तुमने कहा था न कि मुझे कोई ऐसा उपदेश दें जो जीवन भर याद रहे। मैं तुम्हें उसी के लिए यहां लाया हूं। यह एक ऐसा स्थान है जहां तुम्हें आपने प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा।“
इसके बाद संत और वह व्यक्ति एक वृक्ष के नीचे बैठ गए। तभी उन्होंने देखा कि कुछ लोग एक लखपति मनुष्य के शव को लेकर वहां आ रहे हैं। अभी कुछ क्षण बीते थे कि लोग एक दरिद्र आदमी के शव को लेकर वहां पंहुच गए। दोनों की चिता बनाई गई और उन्हें अग्नि में समर्पित कर दिया गया।
यह सब दिखाकर संत उस व्यक्ति को वापस ले आए और दूसरे दिन उसे फिर बुलाया। अगले दिन वह व्यक्ति संत के पास पहुंचा। संत उसे अपने साथ लेकर पुन: श्मशान भूमि में गए। वहां जाकर उन्होंने एक मुट्ठी राख लखपति की चिता की ली और एक मुट्ठी राख दरिद्र की चिता की ली। फिर उस व्यक्ति को वह राख दिखाते हुए कहा,” देखो, मनुष्य अमीर हो या दरिद्र-अतं में दोनों एक समान हो जाते हैं। उनमें कोई अंतर नहीं रहता।“
संत की बात सुनकर उस व्यक्ति की आंखें खुल गईं। यह एक अविस्मरणीय उपदेश था जिसे वह कभी नहीं भूल सकता था।

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